'फ़लस्तीनी शरणार्थियों के वतन वापसी के अधिकार को भी छोड़ने को तैयार'

फ़लस्तीनी शर्णार्थी
Image caption लाखों फ़लस्तीनी शर्णार्थी दुनिया भर के कैंपो में रहते हैं इसी उम्मीद के साथ कि एक दिन वो अपने देश लौट सकेगें.

मध्य-पूर्व शांति वार्ता से संबंधित लीक हुए ताज़ा दस्तावेज़ों के अनुसार फ़लस्तीनी प्राधिकरण नेतृत्व इसराइल के साथ भविष्य में किसी भी शांतिवार्ता में फ़लस्तीनी शरणार्थियों की वतन वापसी के अधिकार को भी छोड़ देने के लिए तैयार हो गया था.

अरबी समाचर नेटवर्क 'अल जज़ीरा' और ब्रिटेन के अख़बार 'गार्डियन' ने इन ताज़ा दस्तावेज़ो को जारी किया है.

बीबीसी के राजनयिक संवाददाता जोनाथन मारकस ने इन नए दस्तावेज़ों की समीक्षा की है.

उनका कहना है कि बीबीसी ने अभी तक किसी भी असली दस्तावेज़ को नहीं देखा है जिनके आधार पर ये रिपोर्ट प्रकाशित की जा रही हैं.

दुनिया भर में रह रहे फलस्तीनियों के अपने देश वापस लौटने के अधिकार को फ़लस्तीनी राष्ट्रीय आंदोलन ने शुरू से ही अपने मूल सिद्दांत और लक्ष्य के रुप में देखा था.

लेकिन इसराइल ने फ़लस्तीनियों के इस अधिकार को मानने से इनकार कर दिया है.

इसराइल का कहना है कि फ़लस्तीनियों की इस मांग को मानने का मतलब है कि ये एक यहूदी राष्ट्र के तौर पर इसराइल की पहचान का अंत होगा.

इसराइल का कहना है कि शांतिवार्ता के नतीजे में भविष्य में बनने वाले किसी भी फ़लस्तीनी राष्ट्र में ये शरणार्थी लौट सकते हैं.

इसराइली पेशकश

अगस्त 2008 में उस वक़्त के इसराइली प्रधानमंत्री येहुद ऑलमर्ट ने शांतिवार्ता के दौरान फ़लस्तीनी शरणार्थियों के वतन वापसी के अधिकार के बारे में अपनी तरफ़ से एक सुझाव दिया था.

इसके तहत 10 हज़ार फ़लस्तीनियों को दस साल के अंदर वतन वापसी का अधिकार होगा.

ताज़ा लीक हुए दस्तावेज़ो के अनुसार फ़लस्तीनी वार्ताकारों ने निजी तौर पर ये बात स्वीकार कर ली थी कि फ़लस्तीनी शरणार्थियों के वतन वापसी के अधिकार के मामले में इससे अधिक कुछ नहीं मिल सकेगा.

ये बिल्कुल निश्चित है कि इन ताज़ा दस्तावेज़ों से फ़लस्तीनी प्राधिकरण नेतृत्व की छवि और भी धूमिल होगी.

दस्तावेज़ों के मुताबिक़ उस वक़्त के इसराइली विदेश मंत्री ज़िपी लीवनी ने यहूदी बस्तियों के बदले इसराइल में रह रहे अरब नागरिकों के नए फ़लस्तीनी राष्ट्र में स्थानांतरण की बात कई दफ़ा उठाई थी.

इसे फ़लस्तीनी वार्ताकारों ने सिरे से ख़ारिज कर दिया था.

जोनाथन मार्कस के मुताबिक ये एक बहुत ही विवादास्पद विचार है और इससे इसराइल के अंदर और मुश्किलें खड़ी हों सकती हैं क्योंकि बड़ी संख्या में इसराइल में रह रहे अल्पसंख्यक अरब नागरिक इसराइली राजनीति में राष्ट्रवादी झुकाव को लेकर बहुत चिंतित हैं.

इन पर प्रतिक्रिया देते हुए अमरीकी विदेश विभाग ने कहा है कि लीक हुए दस्तावेज़ों से इसराइल और फ़लस्तीन के बीच किसी समझौते पर पहुंचना और भी मुश्किल हो गया है लेकिन अमरीका को विश्वास है कि दोनों के बीच समझौता होना अब भी संभव और आवश्यक है.

इस बीच फ़लस्तीन और इसराइल के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले साएब इरेकात ने इन दस्तावेज़ों की वैधता पर सवाल उठाते हुए इन्हें झूठ का पुलिंदा क़रार दिया है.

अरबी के समाचार नेटवर्क अल जज़ीरा ने मध्य पूर्व शांति वार्ता से संबंधित सैकड़ों लीक हुए दस्तावेज़ छापने का दावा किया है जिनमें मध्य पूर्व शांति वार्ता से संबंधित ख़ासी जानकारी है.

अल जज़ीरा का कहना है कि दस्तावेज़ों में फ़लस्तीनियों की पिछले दस साल में इसराइल और अमरीका के साथ हुई बातचीत का गुप्त रिकॉर्ड है जो अब तक सार्वजनिक नहीं हुआ है.

ये दस्तावेज़ पहली बार रविवार रात को जारी किए गए थे.

अल जज़ीरा का कहना है कि रविवार को जारी दस्तेवेज़ों से पता चलता है कि वर्ष 2008 में फ़लस्तीनी वार्ताकार गुप्त तौर पर पूर्वी येरुशलम में इसराइल के अवैध कब्ज़े को बनाए रखने की अनुमति देने के लिए सहमत हो गए थे.

बीबीसी ने दस्तावेज़ों की स्वतंत्र तौर पर पुष्टि नहीं की है.

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