'दोस्त निशाने पर हों तो नींद कैसे आए'

  • 30 जनवरी 2011
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Image caption इसराइली हमले में मारे गए एक फ़लस्तीनी व्यक्ति के परिवार के साथ कारवां में शामिल एक बच्ची.

हम जिस नज़रिए से गज़ा पहुंचे थे, उसके मुताबिक इसराइल आए दिन गज़ा पर छोटे-मोटे हमले करता ही रहता है.

पहले वह बड़े हमले भी कर चुका है और एक पिछली लड़ाई की इबारत इमारतों के मलबे की शक्ल में वहां बिखरी पड़ी थी.

ऐसे अनगिनत मकान दिखते हैं जिसकी दीवारें गोलियों की बौछारों से छिदी पड़ी हैं. ऐसे अनगिनत परिवार हैं जहां के लोग इन गोलियों का शिकार बने हैं. कहने को संयुक्त राष्ट्र यहां मदद करता है लेकिन इसराइली घेराबंदी के कारण वहां सामान कुछ सुरंगों के ज़रिए तस्करी से पहुंचता है.

इसराइल और फ़लस्तीन के बीच के पूरे तनाव की समीक्षा यहां पर मुमकिन नहीं है लेकिन उसे लोग आगे-पीछे खबरों में पढ़कर जान और समझ सकते हैं. कारवां की दास्तां में उसका बड़ा लंबा ब्यौरा ठीक नहीं.

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Image caption गज़ा में महिलाओं की कशीदाकारियों में भी उनका दर्द और वहां की राजनीति की छाप नज़र आती है.

जिस फ़लस्तीन की ज़मीन पर पहुंचने की राह हर कोई महीने भर से देख रहा था, वहां पहुंचकर कारवां में शामिल लोग पिघल गए.

कई नौजवान आंखों में आंसू थे. मैं चूंकि दो-दो कैमरे लिए पूरी लगन से फोटोग्राफी में लगा था इसलिए आंखों में कुछ आने की गुंजाइश नहीं रखी जा सकती. इसलिए उस ज़मीन पर पांव रखकर शरीर को सिर्फ रोंगटे खड़े करने की छूट दी.

गज़ा के इस करीब साढ़े तीन सौ किलोमीटर के इलाके को हमास नाम की जिस पार्टी की सरकार चलाती है, उसकी चुनावी जीत को अमरीका वगैरह नहीं मानते.

इसलिए वहां के प्रधानमंत्री इब्राहिम हन्नान को कुछ लोग विवादास्पद प्रधानमंत्री लिखते हैं.

इस सरकार और इस पार्टी के सरकारी या गैरसरकारी सुरक्षा दस्ते ने पल-पल जिस तरह कारवां के एक-एक को बंधक सा बनाकर रखा, वह किसी सदमे से कम नहीं था. कहने को वहां के बड़े अफसरों का यह कहना था कि यह इसराइली हमले से, साजिश से हमें बचाने के लिए किया गया इंतज़ाम है, लेकिन बात इससे अधिक कुछ थी.

पूरी तैयारी के साथ हमारे मेज़बान हमें किसी शहीद के घरवालों से मिलवाने ले जाते थे, या किसी मस्जिद ले जाते थे, तो वहां भी आसपास किसी से बात करने की कोशिश की भी इजाज़त नहीं थी.

एक कार्यक्रम में सर्द शाम नंगे पैर बच्चों की भीड़ थी. उनसे बात करने की कोशिश शुरू ही की तो इंतज़ाम में लगे पिस्तौलबाज़ आकर ज़बरदस्ती करने लगे कि मैं जाकर कुर्सी पर बैठूं.

यही हाल विश्वविद्यालय की युवतियों से बात करते हुए हुआ, तो तमंची मुझे लगभग धकेलकर बस में ले गए.

सरकारी निगाहों से परे किसी से मिलने की पल भर की इजाज़त नहीं थी. नतीजा यह हुआ कि दूसरे या तीसरे दिन मैंने बौखलाकर एक बड़े अफसर से कहा- “हम आए थे फ़लस्तीन की आज़ादी की लड़ाई का साथ देने के लिए, लेकिन यहां पांव धरते ही जो पहली चीज हमने खोई, वह है हमारी अपनी आजादी.”

लेकिन इस बात का भी कोई असर नहीं हुआ और सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी पता नहीं हमसे क्या छुपाती रही.

एक टीवी चैनल के लोग एक बहस की रिकॉर्डिंग के लिए जब ले गए, तब वहां एक रेस्तरां के बीच सेट बनाया गया था. वहां कई लोग सीधे-सीधे सरकार को कोसते हुए मिले. लेकिन लहूलुहान खंडहर फ़लस्तीन में ही क्यों, भारत जैसे मज़बूत लोकतंत्र में भी लोग सरकार को तो कोसते ही हैं.

अब बात फ़लस्तीनी जनता की करें तो वह मौत के साये में ज़िंदा रहती है और किसी को आने वाले कल का कोई भरोसा नहीं है.

गज़ा इस्लामिक विश्वविद्यालय की छात्राओं से भारतीय छात्रों ने सवाल किए तो एक जवाब साफ़ था- “हमारी पीढिय़ों की मौत के ज़िम्मेदार इसराइल को यहां बने रहने देने वाला कोई रास्ता कभी मंजूर नहीं होगा. बमबारी में इस विश्वविद्यालय की इमारतें ही खत्म नहीं हुईं, लोगों के दिलो-दिमाग में किसी समझौते की जगह भी खत्म दिख रही थी.”

कारवां के कई लोग इसराइल के पूरे खात्मे की बात करते थे तो कई लोग फ़लस्तीनियों और इसराइलियों के सहअस्तित्व की. लेकिन गज़ा के लोगों का कहना है कि आखिरी इसराइली के रहने तक भी आखिरी फ़लस्तीनी चैन से नहीं बैठेगा.

सड़क किनारे हमलों के निशान गहरे थे और समंदर में नाव रूकने की जेटी पर भी बमबारी का मलबा बिखरा हुआ था.

आख़िरी रात तक सुरक्षा अधिकारी मामूली नर्म हुए थे और वे कड़ी निगरानी में एक और ऐसी जेटी तक ले जाने को तैयार हुए जहां पहाड़ की तरह मलबा बिखरा पड़ा था.

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Image caption लड़ाई की इबारतें इमारतों पर नज़र आती हैं.

वहां पूरे अंधेरे में भी मेरे किसी हुनर के बिना मेरे शानदार कैमरों ने बहुत अलग क़िस्म की तस्वीरें खींचीं.

इस पूरी निगरानी के बीच कहां, किस तरह, किन लोगों से हमारी दोस्ती हुई उसकी अधिक जानकारी उन दोस्तों पर खतरा बन जाएगी. लेकिन उनके साथ अपने रोज़ के कई घंटों के संपर्क के बारे में मैंने आज ही किसी और को लिखा कि फ़लस्तीनी लोग कई किस्म के मरहम के ज़रूरतमंद हैं और हम जैसों से मोहब्बत, हम जैसों की मोहब्बत वैसा ही एक जज़्बाती मरहम है.

मैंने इन तमाम देशों में गज़ा के हमारे दोस्तों जैसे बेसब्र दोस्त नहीं पाए जो मानो हाथ थामे बिना बात ही न कर पाते हों.

जब ज़िंदगी और मौत के बीच कम्प्यूटर की-बोर्ड के एक बटन दबने जितना ही फासला हो, तो वैसी बिरादरी शायद दोस्ती को बहुत बड़े-बड़े घूंट भरकर जीती है.

हमसे किसी भी मदद की उम्मीद के बिना जब हमलों तले जीते दोस्त कहते हैं कि पता नहीं दुबारा बात भी हो या न हो, तो चार दिनों में बनी ऐसी दोस्ती भारी लगती है.

और ऐसे में ही मैंने अपने फेसबुक पर लिखा- “जिनके दोस्त युद्धभूमि में बसते हैं, वे लोग कभी चैन की नींद नहीं सो सकते.”

ये दिन कुछ वैसे ही गुजर रहे हैं.

किसी ई-मेल या एसएमएस का जवाब आ जाए तो ही एहसास होता है कि वो हैं. सच तो यह है कि उन्हें पहले किससे नुकसान होगा--इसराइली हमले से या अपनी ही सरकार से--यह भी साफ नहीं है.

मेरी नज़र में हमारे होटल के सामने सर्द सुबह नंगे पैर भीख मांगते आधा दर्जन बच्चे हैं और उन्हें बार-बार भगाते हुए आधा दर्जन पिस्तौलबाज़. वहां की ज़िंदगी आसान नहीं है और हमलों में पीढिय़ां खो सी गई हैं.

(बाकी आखिरी किस्त में)

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