'निर्वाचित सरकार को सत्ता सौंप देंगे'

  • 13 फरवरी 2011
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Image caption मिस्र की सेना ने जनता को आश्वासन देकर अपना रुख़ स्पष्ट किया

मिस्र की सेना ने कहा है कि वो सत्ता की बागडोर देश की निर्वाचित सरकार को सौंपने के लिए प्रतिबद्ध है.

हालांकि इस सत्ता हस्तांतरण के लिए कोई निश्चित समय सीमा नहीं दी गई है.

मिस्र में सितंबर में चुनाव होने थे लेकिन सत्ता में बदलाव के बाद ये मालूम नहीं कि वो कब होंगे.

सेना ने वर्तमान सरकार से फ़िलहाल कार्यवाहक सरकार की स्थिति में बने रहने को कहा है.

शनिवार को सेना की ओर से दिए गए बयान में ये भी कहा गया कि सभी अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को बरक़रार रखा जाएगा.

मिस्र की सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने सरकारी टेलिविज़न को दिए गए इस बयान में इसराइल के साथ समझौते का भी ज़िक्र किया.

सेना की भूमिका

होस्नी मुबारक के पद छोड़ने की घोषणा करते वक्त मिस्र के उप-राष्ट्रपति उमर सुलेमान ने ये साफ़ किया था कि मिस्र में राष्ट्रपति का कार्य अब वहां की प्रभावशाली सैन्य परिषद संभालेगी.

सेना की भावी भूमिका को लेकर लोगों के मन में सवाल उठने शुरू हो गए हैं.

लेकिन सेना ने मुबारक से सत्ता अपने हाथों में लेने के बाद दिए अपने पहले वक्तव्य में ही जनता को आश्वासन दे दिया है.

जानकारों का कहना है कि लोगों के मन में इसराइल के साथ हुई शांति संधि को लेकर उठी आशंकाओं को दूर करने के मक़सद से सेना ने ये वक्तव्य दिया है.

देश की बागडोर संभाल रही सैन्य परिषद के अध्यक्ष फ़ील्ड मार्शल मोहम्मद हुसैन तंतावी के बारे में एक अमरीकी विशेषज्ञ स्टीवन कुक का कहना है कि मिस्र की जनता का उन पर विश्वास नहीं कर सकती.

विदेश नीति

स्टीवन कुक ने कहा "फील्ड मार्शल मोहम्मद हुसैन तंतावी सेना के कुशल रणनीतिज्ञ के रूप में लोकप्रिय शख्सियत नहीं हैं, लेकिन मुबारक परिवार को सुरक्षा प्रदान करने में उनकी भूमिका की चर्चा ज़रूर होती है. मुबारक के वफ़ादार की उनकी ये छवि मिस्र के अधिकतर लोगों की आंखों में खटकती है."

सेना ने हालांकि अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को बरक़रार रखने की बात कही है लेकिन जनता का ध्यान मिस्र की विदेशनीति पर लगा है.

बीबीसी संवादादाता जॉन लिन का कहना है कि सेना ने अपने इस वक्तव्य के ज़रिए ये साफ़ कर दिया है कि वह राजनीति से परे है.

जबकि विपक्ष का कहना है कि वो देश में जल्द लोकतंत्र की बहाली के सबूत देखना चाहता है, एक तानाशाह से दूसरे तानाशाह के हाथों सत्ता की सुपुर्दगी नहीं.

सवाल ये उठ रहे हैं कि क्या सेना की मंशा इसराइल के साथ वही दोस्ताना रवैया कायम रखने की रहेगी. साथ ही क्या हमास से अलगाव भी इसी तरह जारी रहेगा.

ये भी कि क्या ईरान को खींच कर रखने की अमरीकी नीति के तहत अरब देशों के संगठित रुख को बरक़रार रखा जाएगा. या फिर नया मिस्र अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाएगा?

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Image caption आंदोलन के दौरान सेना के रवैये के चलते उसके प्रति आम लोग का रवैया सकारात्मक है

अमरीकी रुख़

पश्चिमी देशों ने मिस्र की सेना से अपील की है कि वो सुनिश्चित करे कि लोकतंत्र का रास्ता शांतिपूर्ण हो.

इस सिलसिले मे अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा अपने प्रमुख सैन्य सलाहकार को जॉर्डन और इसराइल की यात्रा पर भेज रहे हैं.

राष्ट्रपति के प्रमुख सैन्य सलाहकार वहां मिस्र के ताज़ा घटनाक्रम के प्रभाव का जायज़ा लेंगे और साथ ही सुरक्षा मुद्दों पर वाशिंगटन की प्रतिबद्धता के बारे में भी आश्वासन देंगे.

सेना का यह बयान ऐसे समय पर आया है जबकि तहरीर चौक पर हज़ारों लोग अभी भी होस्नी मुबारक के इस्तीफ़े का जश्न मना रहे हैं.

मिस्र में पिछले 18 दिनों जारी राजनीतिक तूफान के बाद जनजीवन सामान्य होता दिखने लगा है.

महिलाएं और पुरुष हाथों में झाड़ू लिए सड़कें बुहार कर साफ़ कर रहे हैं.

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