क्या वाकई मिस्र में कुछ बदलेगा?

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Image caption मिस्र की सत्ता की कमान अब रक्षा मंत्री मोहम्मद तंतावी के हाथ में है.

18 दिनों के ऐतिहासिक प्रदर्शनों के बाद तहरीर का आसमान जश्न और होस्नी मुबारक के सत्ता बाहर होने की ख़ुशी से जगमगा रहा है.

भविष्य के जोड़-घटाव में ख़ुशी के इस इज़हार को धुंधला करना क्रूरता कहलाएगी, लेकिन सच ये है कि मिस्र में जिस तरह मुबारक की रवानगी हुई है उसने लोकतंत्र के कई सवालों के जवाब को अधूरा छोड़ दिया है.

मुबारक के जाने के कुछ घंटों बाद ही मिस्र के वित्त मंत्री ने टेलीविज़न पर कहा कि ‘अब तानाशाही का अंत हो जाएगा’.

हालांकि मिस्र की हक़ीकत ये है कि पिछले 60 साल से नागरिक और सेना के प्रभुत्वशाली लोग इतना घुलमिल चुके हैं कि उन्हें अलग करना मुश्किल है.

‘मुबारक के पिछलग्गू’

दो हफ़्तों के इन प्रदर्शनों के दौरान सेना ने हर क़दम बड़ी सावधानी से रखा और यह छवि बनाई कि वह प्रदर्शनकारियों के साथ है. हालांकि वह अंतिम समय तक भी खुलकर मुबारक के विरोध में सामने नहीं आई.

इसकी एक बड़ी वजह ये है कि सही मायने में लोकतंत्र की स्थापना से सेना को बड़े स्तर पर राजनीतिक और आर्थिक नुक़सान होगा.

यह भी सही है कि मिस्र की आने वाली सरकार अगर इसराइल और हमास को लेकर एक निष्पक्ष और स्वतंत्र विदेश नीति रखती है तो सेना को बड़ी तादाद में मिलने वाली अमरीकी आर्थिक मदद पर बुरा असर पड़ेगा.

मिस्र की सत्ता की कमान अब रक्षा मंत्री मोहम्मद तंतावी के हाथ में है. तंतावी को क़रीब से जानने वाले ख़ासकर उनके जूनियर साथी उन्हें ‘होस्नी मुबारक का पिछलग्गू’ कहते हैं.

क्या कुछ बदलेगा?

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Image caption आंदोलन की ताप खत्म होने पर इसराइल की सत्ता एक कमज़ोर सरकार के हाथ में होगी.

विकीलीक्स की ओर से जारी ख़ुफिया दस्तावेज़ों के मुताबिक, ''तंतावी पूरी तरह आर्थिक और राजनीतिक सुधारों के ख़िलाफ़ है क्योंकि वो मानते हैं कि इससे केंद्र सरकार की ताक़त कम हो जाएगी.''

इस बात की पूरी संभावना है कि वो मुबारक की सत्ता के पुराने ढांचे को ही नए रंग-रोगन के साथ अमल में लाएं.

जर्मनी सहित कई यूरोपीय देशों ने यह इच्छा ज़ाहिर की है कि मिस्र की अगली सरकार मध्य पूर्व में शांति बनाए रखने में अपना योगदान दे और इसराइल को लेकर मुबारक की ओर से किए गए समझौतों को माने.

ये रवैया अपने आप में दिखाता है कि मिस्र की नई सरकार की लोकतांत्रिक ताक़त यूरोपीय देशों के लिए कोई ख़ास महत्व नहीं रखती.

कुल मिलाकर सामाजिक बदलाव के लिए किए गए आंदोलन की ताप ख़त्म होने पर इसराइल की सत्ता एक कमज़ोर सरकार के हाथ में होगी.

यही वह समय है जब आज़ादी और बदलाव की मांग कर रही जनता को यह देखना होगा कि प्रदर्शनों और नई सरकार के अस्तित्व के लिए एकजुट होने का उसे क्या सिला मिला.

जनता अगर अपने सपने को हक़कीत में बदलना चाहती है तो जश्न के सुरुर के बाद उसे फिर होश में आना होगा और सचेत रहना होगा.

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