छत्तीसगढ़ के 'धान वाले बाबा'

  • 22 फरवरी 2011
राशन की दुकान
Image caption छत्तीसगढ़ में पैंसठ प्रतिशत आबादी को सस्ता धान मिलता है

भारत की दस प्रतिशत विकास दर की तारीफ़ करने वालों की संख्या बहुत बड़ी है पर शायद उतनी ही बड़ी संख्या में वे लोग है जो विकास दर के मापदंड पर सवाल उठाते हैं.

खासकर एक ऐसे माहौल में जहां बढ़ती महंगाई ने ग़रीबों की जेब पर डाका डाला है और ग़रीब आदमी भर पेट भोजन भी नहीं खा पा रहा.

ऐसे में सस्ते में राशन देने के वादे राजनीति में नेताओं के लिए तुरुप का पत्ता साबित हो रहे है. केंद्र सरकार भी खाद्य सुरक्षा बिल के ज़रिए ये काम करने की कोशिश कर रही है हालांकि मुफ्त या सस्ते में कितना अनाज आम आदमी को देना है उस पर अभी तक सहमति नहीं बन पा रही.

इस बीच छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री रमन सिंह अपनी खाद्यान्न सुरक्षा योजना को देशव्यापी बनाने का सपना देख रहे है.

उनको लोग भात वाले बाबा बुलाने लगे है और वो इसलिए की 2007 से राज्य में अंत्योदय और ग़रीब परिवारों को हर महीने एक और दो रुपए किलो के हिसाब से 35 किलो चावल मिलने लगा है.

इसके अलावा ग़रीबी रेखा से ऊपर लोगों को भी राज्य सरकार सस्ते में राशन उपलब्ध करा रही है और इस सब पर खर्च आ रहा है कोई एक हज़ार करोड़.

रमन सिंह कहते है, ''मेरे यहां 23 लाख परिवार बीपीएल हैं और चावल हम दे रहे हैं उससे दोगुने परिवारों को. यानि जो एपीएल में है उन्हें भी. हम ये नहीं कहते कि बीपीएल को चावल दे रहे हैं, हम ग़रीबों को चावल दे रहे हैं. छत्तीसगढ़ की आबादी के 65 प्रतिशत लोगों को चावल मिल रहा है.''

सुव्यवस्थित करने की कोशिश

राशन व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी इसमें फैली अव्यवस्था है. राज्य सरकार की कोशिश है कि राशन के वितरण को सुव्यवस्थित किया जाए और कालाबाज़ारी रोकी जाए.

छत्तीसगढ़ सरकार ने सार्वजनिक वितरण व्यवस्था को निजी हाथों से निकाल कर जहां तक संभव है जनजातियों, महिलाओं के स्वसहायता समूहों, ग्राम पंचायतों आदि के हाथों में सौंप दिया है ताकि मुनाफ़ाखोरी के चक्कर में धांधली को रोका जा सके.

धमतरी में एक महिला दुकानदार कहती है कि पहले जो व्यापारी दुकान चलाता था वो कार्ड फैंक देता था, दुकान बंद रखता था पर वो नियमित दुकान खोलती हैं और गड़बड़ नहीं होने देतीं.

ये दुकान दस महिलाओं का एक स्वसहायता समूह चलाता है. सरकार इन्हें दुकान खोलने, राशन भरने के लिए ऋण देती है और राशन पर कमीशन भी ज़्यादा देती है ताकि धांधली कम हो. साथ ही खाद्य इंस्पेक्टर गड़बड़ करने वालों पर नज़र रखते हैं.

नई व्यवस्था

प्रदीप रिछारिया जोकि धमतरी में एक खाद्य इंस्पेक्टर हैं वो कहते हैं कि छोटी मोटी शिकायतों पर भी कड़ी कार्रवाई होती है और सारी व्यवस्था का कंप्यूटरीकरण कर दिया गया है. कोई भी जान सकता है कि कितने लोगों को राशन मिला और राशन कहा है.

पर ऐसा नहीं है कि शिकायतें नहीं आतीं और पूरी व्यवस्था में कोई खामी नहीं. हमारी मुलाकात ग़रीबी रेखा से ऊपर रहने वाले कुछ लोगों से हुई जिनका कहना था कि पिछले दो महीनों से उन्हें राशन में केवल मिट्टी का तेल मिला, चावल नहीं.

Image caption सार्वजनिक वितरण व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने की छत्तीसगढ़ की कोशिश

राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता अजीत जोगी कहते हैं, ''किसी ग़रीब को राशन नहीं मिलता. खासकर अगर आप हमारे जनजाति बहुल क्षेत्रों जैसे बस्तर या सरगुजा जाएं तो वहां राशन पहुंचता ही नहीं, बड़े शहरों से ही ये ग़ायब हो जाता है. हां कागज़ पर राशन का डिस्ट्रिब्यtशन दिखा दिया जाता है.''

हालांकि वो इस बात को भी मानते हैं कि केंद्र में सत्तारुढ़ कांग्रेस भी छत्तीसगढ़ मॉडल की तारीफ़ करती है.

मुख्यमंत्री का कहना है कि 11 राज्य इस मॉडल को समझने आए है और वे चाहते हैं कि ये व्यवस्था राष्ट्रीय स्तर पर लागt हो. हालांकि बाकी राज्यों को Sk हज़ार करोड़ का खर्च भारी पड़ सकता है.

रमन सिंह के विरोधी मानते हैं कि सस्ते अनाज को 65 प्रतिशत लोगों तक बहुरंगी राशन कार्डों के ज़रिये पहुंचाने का कुल मिलाकर मुख्यमंत्री को बड़ा राजनीतिक फायदा हो रहा है.

और इस व्यवस्था की आलोचना करने वाली विपक्षी कांग्रेस का भी कहना है कि अगर वो सत्ता में आई तो उसे भी योजना को जारी रखना पड़ेगा या शायद मुफ्त चावल बांटना पड़ेगा.

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