गद्दाफ़ी अब भी सत्ता में कैसे बने हुए हैं?

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मध्य पूर्व में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के बीच, जहाँ लीबिया के कर्नल गद्दाफ़ी के दो पड़ोसी देशों के शासक सत्ता छोड़ भाग गए हैं, वहीं गद्दाफ़ी की सत्ता किस आधार पर टिकी हुई है.

वास्तव में मिस्र और ट्यूनिशिया से अलग, लीबिया में सत्ता का संतुलन सेना तय नहीं करती है.

इसकी जगह कई अर्धसैनिक ब्रिगेड्स का नेटवर्क और कर्नल गद्दाफ़ी के समर्थकों की 'रेवोल्युश्नरी सिमतियाँ,' कबायली नेता और विदेशों से लाए गए भाड़े के सैनिक तय करते हैं की सत्ता किसके हाथ में रहेगी.

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असल में लीबियाई सेना तो प्रतीकात्मक ही है और लगभग 40 हज़ार की ये फ़ौज न तो आधुनिक हथियारों से लौस है और न ही इसे अच्छा प्रशिक्षण हासिल है.

ऐसा इसलिए है क्योंकि कर्नल गद्दाफ़ी दर्घकालिक रणनीतिक के तहत सेना की ओर से तख़्तापलट की किसी भी संभावना को ख़त्म कर देना चाहते हैं. वे वर्ष 1969 में ऐसे ही सैन्य तख़्तापलट के ज़रिए सत्ता में आए थे.

इसलिए बेनग़ाज़ी में सेना के कुछ लोगों के प्रदर्शनकारियों का साथ देने से कर्नल गद्दाफ़ी ज़्यादा विचलित नहीं होंगे. इसीलिए पूर्वी लीबिया में इनकी छावनियों पर हवाई हमले भी हुए हैं.

सुरक्षातंत्र का फैलाव, ख़ौफ़

इस क्षेत्र के कई अन्य देशों की तरह लीबिया में भी व्यापक फ़ैलाव वाला, ख़ासे संसाधनों वाला और काफ़ी क्रूर माना जाने वाला आंतरिक सुरक्षा तंत्र है.

इसकी तुलना वर्ष 1989 से पूर्व रोमानिया या पूर्वी जर्मनी के आंतरिक सुरक्षा तंत्र से की जा सकती है, जब सार्वजनिक तौर पर लोग कुछ बोलने से डरते थे कि कहीं ख़ुफ़िया पुलिस तक कोई जानकारी न पहुँचा दे.

मैं इससे पहले जब भी लीबिया में गया तो मैंने पाया कि आम लोग खुलकर कुछ भी बोलने से डरते थे क्योंकि सरकार के एजेंट सदा नज़र रखते थे और कौन क्या कहता था, उसकी ख़बर भी रखते थे.

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कर्नल गद्दाफ़ी के कुछ पुत्रों ने आंतरिक सुरक्षा के विभाग में काम किया है लेकिन आज आंतरिक और बाहरी सुरक्षा में अहम व्यक्ति गद्दाफ़ी के दामाद अब्दुल्ला सेनुसी हैं.

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Image caption गद्दाफ़ी ख़ुद एक सैन्य तख़्तापलट के ज़रिए 1969 में सत्ता में आए थे

वे कट्टरपंथी हैं जिनकी एक छवि एक बाहुबली के समान है. जब तक वे गद्दाफ़ी के सलाहकार रहते हैं और उन्हें कड़े कदम उठाने की सलाह देते रहते हैं तब तक उनकी सत्ता से हटने की संभावना कम है.

गद्दाफ़ी की वफ़ादार रेवोल्यूश्नरी समितियाँ

लीबिया में कई विशेष ब्रिगेड्स हैं जिनकी जवाबदेही सेना को नहीं बल्कि गद्दाफ़ी की रेवोल्यूश्नीर समितियों को है.

इनमें से एक ब्रिगेड की कमान गद्दाफ़ी के बेटे हानीबल के हाथ में हैं. इन पर हाल में होटल कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार के आरोप लगने के बाद, इनकी स्विट्ज़रलैंड की पुलिस के साथ हाथापाई हुई थी.

जन-सेना के नाम से जाने जाते ये अर्धसैनिक बल अब तक तो गद्दाफ़ी के वफ़ादार रहे हैं.

यदि ये अर्धसैनिक बल गद्दाफ़ी का साथ छोड़ देते हैं और प्रदर्शनकारियों के साथ हो जाते हैं तो गद्दाफ़ी के सत्ता में बने रहने की संभावना बहुत क्षीण हो जाएगी.

लीबियाई संघर्ष का सबसे ख़तरनाक और गंभीर पहलू है भाड़े के सैनिक.

ऐसी रिपोर्टें लगातार आ रही है कि गद्दाफ़ी प्रशासन अफ़्रीका, विशेष तौर पर चाड और निजेर से भाड़े के सैनिकों का व्यापक इस्तेमाल कर रहा है.

ये निशस्त्र आम नागरिकों के ख़िलाफ़ दमनकारी नीतियाँ अपना रहे हैं.

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लीबियाई प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया है कि ये लोग छतों से प्रदर्शनकारियों की भीड़ पर गोलियाँ चला रहे हैं. इस तरह से वे उन आदेशों का पालन कर रहे हैं जिन्हें लीबियाई सैनिकों ने मानने से इनकार कर दिया है.

कर्नल गद्दाफ़ी के कई अफ़्रीकी देशों के साथ घनिष्ठ संबंध हैं क्योंकि अरब देशों से वो काफ़ी समय से दूर रहे हैं.

साठ लाख की जनसंख्या वाले लीबिया में लगभग पाँच लाख लोग बाहर से आए हैं.

गद्दाफ़ी के समर्थन वाले भाड़े के सैनिकों की संख्या कम है लेकिन उनकी वफ़ादारी पर कोई सवाल नहीं है और ऐसी रिपोर्टें है कि हाल के दिनों में अतिरिक्त उड़ानों के ज़रिए और ऐसे लोगों को लाने का प्रबंध किया गया है.

क्या कबायलियों को उतारेंगे गद्दाफ़ी?

यमन और इराक़ की तरह लीबिया ऐसा देश हैं जहाँ आपका कबीला क्या है, ये तय कर सकता है कि आपकी वफ़ादारी किस ओर होगी.

लेकिन वर्ष 1969 के बाद से लेकर अब तक कबायली पहचान उतनी मज़बूत नहीं रही है.

कर्नल गद्दाफ़ी क़धाथ्था कबीले के हैं. अपने 41 साल के शासनकाल में उन्होंने अपने कबीले के कई लोगों को अपनी निजी सुरक्षा समेत कई अहम पदों पर नियुक्त किया है. इराक़ में सद्दाम हुसैन और यमन में राष्ट्रपति सलेह की तरह, कर्नल गद्दाफ़ी ने भी काफ़ी कुशलता के साथ एक कबीले को दूसरे कबीले के ख़िलाफ़ खड़ा किया है ताकि उनकी सत्ता को कोई ख़तरा न रहे.

लीबिया पर नज़र रखने वालों की निगाहें अब इस पर टिकी हैं कि क्या लीबियाई सरकार गृह युद्ध की अपनी भी भविष्यवाणी को साकार करते हुए, पूर्वी लीबिया में, वफ़ादार कबायली नेताओं को हथियारों से लैस कर प्रदर्शनकारियों के विद्रोह को कुचलती है या नहीं.

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