सुरक्षा परिषद ने दी 'कार्रवाई' को मंज़ूरी, बेनग़ाज़ी में जश्न

  • 18 मार्च 2011
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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने लीबिया पर एक प्रस्ताव पारित किया है जिसके तहत वहाँ 'नागरिकों और नागरिक क्षेत्रों' को कर्नल गद्दाफ़ी की फ़ौज के हमलों से बचाने के लिए सदस्य देशों को 'सभी ज़रूरी क़दम' उठाने की अनुमति दी गई है.

इसके बाद अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ब्रिटेन और फ़्रांस के नेताओं से फ़ोन पर बातचीत की है. प्राप्त जानकारी के अनुसार सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव को लागू करने के बारे में ओबामा ने इन देशों के नेताओं से चर्चा की है.

इस प्रस्ताव के अनुसार लीबिया 'नो फ़्लाई ज़ोन' होगा और वहाँ राहत सामग्री ले जा रहे विमानों को छोड़ अन्य किसी विमान को उडा़न भरने की इजाज़त नहीं होगी. लेकिन प्रस्ताव में विदेशी थल सेना का इस्तेमाल शामिल नहीं है.

ये प्रस्ताव ब्रिटेन, फ़्रांस और लेबनान ने रखा था और इसके पक्ष में दस देशों ने वोट दिया और किसी भी देश ने इसका विरोध नहीं किया.

लीबिया पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के कुछ प्रमुख सदस्य देशों का रुख़ जानें

ग़ौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों में से दो - रूस और चीन ने वीटो का इस्तेमाल तो नहीं किया लेकिन उन्होंने मतदान में भी हिस्सा नहीं लिया.

भारत, जर्मनी और ब्राज़ील ने भी मतदान में हिस्सा नहीं लिया. इन देशों का मानना है कि ऐसी सैन्य कार्रवाई अंतत: लीबिया के आम नागरिकों की मदद करने की जगह उन्हें नुकसान पहुँचाएगी.

फ़्रांसीसी अधिकारियों ने कहा है कि अगले कुछ घंटों के अंदर ही सैन्य कार्रवाई शुरु हो सकती है. बीबीसी संवाददाता बारबरा प्लेट के अनुसार प्रस्ताव पारित होने के बाद ब्रितानी और फ़्रांसीसी लड़ाकू विमान लीबियाई सेना के ठिकानों पर हवाई हमले कर सकते हैं.

विद्रोहियों-गद्दाफ़ी की सेना के बीच झड़पें

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Image caption प्रस्ताव पारित होने के बाद बेनग़ाज़ी में लोगों ने जश्न मनाया

लीबिया में कर्नल गद्दाफ़ी 1969 से सत्ता में बने हुए है.

ट्यूनिशिया और मिस्र में सरकार विरोधी प्रदर्शनों और सत्ता परिवर्तन के बाद, पिछले लगभग एक महीने से लीबिया में सरकार विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं.

पिछले कुछ हफ़्तों में इन प्रदर्शनों ने विद्रोहियों और गद्दाफ़ी समर्थकों के बीच सशस्त्र झड़पों का रूप ले लिया है और कई शहरों पर विद्रोहियों का कब्ज़ा हो गया है.

लेकिन इसके बाद गद्दाफ़ी समर्थक फ़ौज ने हवाई हमलों, टैंकों और आधुनिक हथियारों के इस्तेमाल से विद्रोहियों को कई शहरों से खदेड़ दिया है.

लीबिया के अनेक शहरों से हज़ारों लोगों, विशेष तौर पर वहाँ काम कर रहे विदेशी लोगों का पलायन हुआ है.

विदेशी मीडिया को राजधानी त्रिपोली से बाहर जाने की इजाज़त नहीं है और राजधानी से बाहर चल रही झड़पों, आम नागरिकों की मौत और प्रभावित क्षेत्रों के हाल के बार में स्वतंत्र और पुष्ट जानकारी ले पाना मुश्किल है.

बेनग़ाज़ी में जश्न

सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव रखते हुए फ़्रांस के विदेश मंत्री एलेन जूप ने कहा, "लीबिया में पिछले कई हफ़्तों से जनता की इच्छा शक्ति को कर्नल गद्दाफ़ी की ओर से दबाया जा रहा है जो अपने ही लोगों पर हमले कर रहे हैं. हम जंग के लिए उकसाने वाले इन लोगों को ऐसा नहीं करने दे सकते, हम आम नागरिकों को छोड़कर भाग नहीं सकते....हमें ज़्यादा देर नहीं करनी चाहिए."

संयुक्त राष्ट्र में अमरीकी दूत सूज़न राइस ने अपने भाषण में कहा, "इस प्रस्ताव से कर्नल गद्दाफ़ी और उनकी सरकार को कड़ा संदेश जाना चाहिए. हिंसा बंद होनी चाहिए, लीबियाई जनता की रक्षा होनी चाहिए और उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होनी चाहिए.

संयुक्त राष्ट्र में ब्रिटेन के राजदूत मार्क लायल ग्रांट ने अपने संबोधन में कहा, "कर्नल गद्दाफ़ी की सरकार की कार्रवाई की निंदा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय एकत्र हुआ है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय ये मांग करने के लिए एकत्र हुआ है कि लीबियाई लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा ख़त्म हो...ब्रिटेन अपनी ज़िम्मेदारी निभाने के लिए तैयार है."

उधर बेनग़ाज़ी में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव का जश्न के साथ स्वागत हुआ है. कई जगह लोगों ने हवा में फ़ायरिंग की है और आतिशबाज़ी हुई है.

मतदान की ख़बर आते ही लोगों ने विद्रोहियों के झंडे भी फहराए.

लेकिन लीबिया के उप विदेश मंत्री ख़ालेद कायिम ने कहा कि सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव का मतलब है - 'लीबियाई लोगों को एक दूसरे को मार देने का आहवान करना. ये प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ओर से बहुत ही आक्रामक रुख़ दिखाता है जिससे लीबिया की एकता और स्थायित्व को ख़तरा है.'

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