मध्यपूर्व में विद्रोह की आंधी

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मध्यपूर्व पिछले कई दशकों से असंतोष और आक्रोश से घिरा रहा रहा है. लेकिन मिस्र और ट्यूनीशिया में हुए सफल विद्रोह और सत्ता परिवर्तन के बाद अब क्षेत्र के कई देशों में जनता सड़कों पर उतर रही है और शासकों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रही है.

सीरिया, बहरीन और यमन में पिछले कुछ दिनों में सरकार विरोधी प्रदर्शनों में खासी तेज़ी आई है. क्यों हैं लोग नाखुश और क्या हैं उनकी मांगे?

सीरिया

सीरिया में लगभग 50 सालों से आपातकाल लागू है और इस दौरान एक ही पार्टी सत्ता में रही है. ग़रीबी बहुत ज़्यादा है और राजनीतिक आज़ादी बहुत कम.

यहां कई समुदाय के लोग हैं लेकिन अरबी सुन्नी बहुमत में हैं. अलवी शिया समुदाय के मज़बूत समर्थन से बनी बाथ पार्टी यहां सत्ता में है. राष्ट्रपति हाफ़िज अल असद की मौत के बाद से बशर अल असद देश के राष्ट्रपति हैं.

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Image caption राष्ट्रपति असद पर राजनीतिक सुधार तेज़ करने का दबाव है.

तीन दशकों के निरंकुश शासन के बाद जब 2000 में बशर अल असद सत्ता में आए तो उन्होंने कुछ सुधारवादी फ़ैसले किए, राजनीतिक आज़ादी दी और कई राजनीतिक क़ैदियों को रिहा किया. अभिव्यक्ति की आज़ादी की भी बात सामने रखी गई. लेकिन सुधार की गति से चिंतित सेना, बाथ पार्टी और अल्पमत अलवी समुदाय ने इस पर रोक लगाने के प्रयास शुरू कर दिए.

लोग सही मायने में सुधार के साथ-साथ नौकरियों और बेहतर जीवन-स्तर की मांग कर रहे हैं.

सीरिया में अभी भी आपात क़ानून लागू हैं और लोग इन्हें हटाने की मांग कर रहे हैं. राजनीतिक सुधारों की मांग तेज़ हो रही है. राजनीतिक क़ैदियों को रिहा किए जाने के लिए भी आंदोलन तेज़ हो रहे हैं.

मिस्र और ट्यूनीशिया में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद राष्ट्रपति बशर अल असद ने कहा था कि सरकार लोगों की सोच को समझती है और वहां जन असंतोष नहीं है. लेकिन आंदोलन में आ रही तेज़ी से ऐसा प्रतीत नहीं होता.

यमन

यमन अरब जगत के सबसे ग़रीब देशों में से है और वहां आधी से ज़्यादा आबादी अस्सी रूपए से कम की दैनिक आमदनी पर जीती है. वहां अल क़ायदा का तंत्र ख़ासा सक्रिय है और उत्तरी हिस्से में कुछ शिया असंतुष्ट गुटों की भी पैठ है.

यमन में 11 फ़रवरी से सरकार विरोधी प्रदर्शनों की शुरूआत हुई और 32 सालों से राष्ट्रपति रहे अली अब्दुल्ला सालेह ने 21 मार्च को अपनी सरकार को बर्ख़ास्त करने का आदेश दे दिया.

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Image caption यमन अरब जगत के सबसे ग़रीब देशों में से है.

उन्होंने पहले ही एलान कर दिया था कि वो फिर से कुर्सी के लिए नहीं लड़ेंगे और न ही अपने बेटे को सत्ता हस्तांतरित करेंगे.

कुछ हफ़्ते पहले तक जनता थी कि देश में राजनीतिक सुधार हों लेकिन सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ सरकारी हिंसा के बाद से राष्ट्रपति सालेह के फ़ौरन इस्तीफ़े की मांग ने ज़ोर पकड़ ली.

राष्ट्रपति ने अपनी कैबिनेट को बर्खास्त करने का एलान तो कर दिया है लेकिन साथ ही कहा है कि जबतक नई सरकार सत्ता में नहीं आती तब तक ये कैबिनेट कार्यकारी भार संभालती रहेगी.

बहरीन

बहरीन 1971 में ब्रिटेन से आज़ाद हुआ और तब लोगों को थोड़े समय के लिए लोकतंत्र का स्वाद चखने को मिला. लेकिन कुछ ही सालों के बाद तब से आजतक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे शेख ख़लीफ़ा इब्न सलमान अल ख़लीफ़ा ने संसदीय लोकतंत्र को ख़त्म कर दिया.

सुन्नी समुदाय के ख़लीफ़ा परिवार ने शिया बहुमत वाले बहरीन पर दशकों तब बेहद सख़्ती से शासन किया है. साल 2005 में संसदीय चुनाव भी हुए लेकिन ये सुनिश्चित कर लिया गया कि सरकार में शिया अल्पमत में ही रहें.

पिछले दिनों में शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद शाह हमद बिन इसा अल ख़लीफ़ा ने तीन महीनों के लिए आपातकाल का एलान कर दिया है. प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ सुरक्षा बलों ने काफ़ी सख़्त कदम उठाए हैं और उन्हें किसी को भी बिना कारण बताए गिरफ़्तार करने का अधिकार मिला है.

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Image caption बहरीन में राजनीतिक आज़ादी के साथ-साथ प्रधानमंत्री की बर्खास्तगी की मांग ज़ोर पकड़ चुकी है.

शियाओं का कहना है कि वो आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं, उन्हें राजनीतिक आज़ादी नहीं मिली है और नौकरियों में भी उनके साथ सुन्नियों के हक़ में भेदभाव किया जाता है. विरोध प्रदर्शनों में इन सबके ख़िलाफ़ आवाज़ें उठ रही हैं.

इसके अलावा राजनीतिक क़ैदियों की रिहाई और और एक नए संविधान की भी मांग हो रही है.

ग़ौरतलब है कि सुन्नियों का युवा वर्ग भी इन प्रदर्शनों में शियाओं का साथ देकर लोकतंत्र की मांग कर रहा है.

प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ हिंसा के लिए ज़िम्मेदार माने जानेवाले प्रधानमंत्री शेख ख़लीफ़ा बिन सलमान अल ख़लीफ़ा की बर्ख़ास्तगी की मांग भी काफ़ी तेज़ हो चुकी है.

संयुक्त राष्ट्र ने भी बल प्रयोग की भर्त्सना की है.

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