'ग्वांतानामो के बाद अमरीका तो 2002 के दंगों पर न बोले'

  • 22 मार्च 2011
मोदी
Image caption नरेंद्र मोदी का अमरीका जाने का वीज़ा 2005 में रद्द कर दिया गया था

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2006 में एक अमरीकी राजनयिक से कहा था कि अमरीका को वर्ष 2002 की घटनाओं (गुजरात में मुस्लिम विरोधी दंगे) में दख़ल देने का हक़ नहीं है क्योंकि ये गुजरात का अंदरूनी मामला है.

इसी के साथ उसी बैठक में मोदी ने ये भी कहा कि अबू ग़रैब, ग्वातानामो और 9/11 के बाद सिखों पर हमले दर्शाते हैं कि अमरीका ख़ुद मानवाधिकारों के भयावह तरीके से हुए हनन का दोषी है.

विकीलीक्स पर सार्वजनिक हुए और ‘द हिन्दू’ अख़बार में छपे मुंबई स्थित अमरीकी काउंसुल जनरल माइकल एस ओवेन के संदेश से पता चला है कि 16 नवंबर, 2006 को ओवेन और मोदी के बीच गांधीनगर में हुई बातचीत में वर्ष 2002 के मुस्लिम विरोधी दंगो पर व्यापक चर्चा हुई थी.

दरअसल मार्च 2005 में अमरीका जाने के लिए नरेंद्र मोदी को दिया गया वीज़ा वर्ष 2002 के दंगों और तत्कालीन मोदी सरकार पर लगे आरोपों को देखते हुए रद्द कर दिया गया था.

लेकन इस कूटनयिक संदेश से ये भी स्पष्ट होता है कि अमरीका मोदी के भारत की राष्ट्रीय राजनीति और भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व में सक्रिय होने और संभवत: बड़ी भूमिका निभाने से काफ़ी दुविधा में था.

अमरीका को ये चिंता थी कि एक व्यक्ति जिसका कुछ साल पहले वीज़ा रद्द किया गया और यदि वह भारत की राष्ट्रीय राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाने लगे तो उससे जब दोबारा संपर्क साधा जाएगा तो अमरीका पर अवसरवादी होने का आरोप लगेगा.

दंगों के लिए मोदी माफ़ी नहीं माँगेंगे: अमरीका

अमरीका के मुंबई स्थित काउंसिल जनरल माइकल एस ओवेन की 16 नवंबर 2006 की मोदी के साथ मुलाकात पर 27 नवंबर 2006 को अमरीकी विदेश मंत्रालय को कूटनयिक संदेश भेजा गया.

ओवेन ने मोदी से कहा कि व्यवसायिक और लोगों के बीच संपर्क से तो अमरीका ख़ुश है लेकिन वर्ष 2002 के दंगों के लिए किसी को सज़ा नहीं हुई है और इससे गुजरात में सांप्रदायिक संबंध बिगड़ सकते हैं. कूटनयिक संदेश के मुताबिक ऐसा सुनने पर मोदी बिगड़ गए.

मोदी ने कहा, "अमरीका को वर्ष 2002 की घटनाओं (गुजरात में मुस्लिम विरोधी दंगे) में दख़ल देने का हक़ नहीं है क्योंकि ये गुजरात का अंदरूनी मामला है. अबू ग़रैब, ग्वातानामो और 9/11 के बाद सिखों पर हमले दर्शाते हैं कि अमरीका ख़ुद मानवाधिकार के भयावह तरीके हुए हनन का दोषी है. ये स्पष्ट है कि गुजरात में मुसलमान भारत के अन्य राज्यों के मुकाबले में बेहतर स्थिति में है. तो सभी की समस्या क्या है?"

ओवेन ने उन्हें गुजरात दंगों के बारे में भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की टिप्पणी की याद दिलाई और कहा कि अमरीका अबू ग़रैब जैसी घटनाओं की जाँच, अभियुक्तों पर मुक़दमा और दोषियों को सज़ा दिलाने का प्रयास करता है और गुजरात में भी यही देखना चाहता है.

इस पर मोदी का रुख़ था कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग पूर्वाग्रह से ग्रस्त है और अमरीका उन ग़ैर सरकारी संगठनों की रिपोर्टों पर ज़्यादा निर्भर करता है जिन्हें असलियत का पता ही नहीं है.

मोदी का कहना था कि यदि किसी अधिकारी ने कुछ ग़लत किया है तो ये अदालत पर है कि उसे सज़ा दे, क्योंकि मुख्यमंत्री अदालत के काम में दख़ल नहीं दे सकता है.

लेकिन मोदी ने इस बारे में स्पष्ट जवाब नहीं दिया कि क्या दंगों के मामलों में कोई जाँच हो रही है. उनका कहना था कि हाल में स्थानीय निकायों के चुनावों में मुस्लिम बहुल ज़िलों में भाजपा की जीत हुई है और वर्ष 2002 की घटनाओं में तो कुछ शरारती तत्व शामिल थे लेकिन इन घटनाओं को ज़रूरत के ज़्यादा बड़ा बनाकर पेश किया गया.

इस कूटनयिक संदेश के अंत में काउंसुल जनरल ओवेन ने लिखा, "स्पष्ट है कि मोदी वर्ष 2002 का हिंसा के बारे में न तो माफ़ी मांगेंगे और न ही इस मामले में किसी तरह से पीछे हटेंगे. लेकिन हमारे लिए उन्हें ये याद दिलाना ज़रूरी है कि समय बीत जाने के बाद भी हम उन्हें इन घटनाओं की याद दिलाते रहेंगे."

मोदी को नज़अंदाज़ करने से प्रभाव घटेगा: अमरीका

माइकल एस ओवेन के अनुसार, "यदि मोदी (भाजपा के) राष्ट्रीय नेतृत्व में कोई भूमिका निभाते हैं तो अमरीकी सरकार को तय करना होगा कि वह ऐसे व्यक्ति से कैसा संपर्क रखना चाहता है जिसका पूर्व में वीज़ा रद्द कर दिया गया हो. मैं मानता हूँ कि मोदी को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ करने से हमारा प्रभाव घटेगा. वर्ष 2002 के दंगों के बाद हमने राजदूत के स्तर पर मोदी से संपर्क नहीं रखा है. लेकिन मुंबई के काउंसुल जनरल जब भी अहमदाबाद गए हैं तो वे लगातार उनसे मिलते रहे हैं और आगे भी मिलते रहेंगे ताकि ये बताया जा सके कि अमरीका की इस मुद्दे पर कोई औपचारिक नो कॉन्टेक्ट नीति यानी संपर्क न रखने की नीति नहीं है."

अमरीकी राजनयिक के आकलन के मुताबिक मोदी ने ख़ुद को सफलतापूर्वक भ्रष्टाचार से मुक्त, असरदार प्रशासक, राज्य में उद्योग को बढ़ावा देने वाले, बिना रोक-टोक हिंदू बहुसंख्या के हित में क़ानूनी व्यवस्था को कायम रखने वाले राजनीतिक नेता के तौर पर री-ब्रॉंड किया है यानी नया चेहरा पेश किया है. मोदी के समर्थक मानते हैं कि वे भाजपा नेतृत्व को मना सकते हैं कि इस तरह से वे पूरे भारत में वोटरों को पार्टी की ओर आकर्षित कर सकते हैं."

भाजपा सांसद हरिन पाठक के हवाले से ओवेन कहते हैं कि आडवाणी मानते हैं कि केवल मोदी भाजपा ने नई जान फूँक सकते हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राम माधव भी ऐसा ही मानते हैं.

अमरीकी राजनयिक के आकलन के अनुसार मोदी सार्वजनिक तौर पर ख़ुद को पसंद किए जाने लायक और आकर्षक नेता के तौर पर प्रस्तुत करते हैं लेकिन वे बाहरी प्रभाव से रहित, शक्की व्यक्ति हैं जो अपने चुनिंदा सलाहकारों के गुट के साथ शासन चलाते हैं.

ओवेन का विश्लेषण था, "नरेंद्र मोदी सर्वसम्मति और सभी को साथ लेकर शासन चलाने की जगह डर और धमकियों के आधार पर काम करते हैं. वे कई बार अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ भी अशिष्ट और अपमानजनक तरीके से पेश आते हैं और फ़ैसले लेते समय सत्ता को अपने ही हाथों में रखते हैं."

संबंधित समाचार