दिल्ली के दिल में जश्न

indiagate celebration

मिसबाह उल हक़ के रुप में पाकिस्तान का आख़िरी विकेट गिरना तो महज़ एक औपचारिकता थी.

दिल्ली वालों ने तो शाहिद आफ़रीदी के आउट होने पर ही इस मैच का फ़ैसला तय कर लिया था.

मैं भी उनमें से एक थी जिन्होंने शाहिद का कैच लपके जाने के बाद लोगों को जश्न का ऐलान करते देखा.

और इस जश्न के लिए ‘दिल्ली के दिल’ से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती थी. लोगों के मूड का जायज़ा लेने कनॉट प्लेस का गश्त लगाते हुए हमारा क़ाफ़िला इंडिया गेट पहुंचा.

वैसे इंडिया गेट पर ऐसा जमावड़ा मैंने अब तक सिर्फ़ शांति मार्च या विरोध प्रदर्शन के लिए ही देखा था. लेकिन जो नज़ारा वहां कल रात देखने को मिला, वो भारत में शांति और एकता के प्रतीक से कुछ कम नहीं था.

वहां कोई किसी को नहीं जानता था, लेकिन देशभक्ति की भावना से सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए नज़र आ रहे थे.

अनेकता में एकता

Image caption कुछ इस तरह से लोगों ने अपनी ख़ुशी का इज़हार किया.

लोगों के चेहरे पर चमक देखते ही बनती थी...और क्यों न हो... उनके लिए ये मैच जीतना किसी जंग जीतने से कम थोड़े ही था!

पलक झपकते ही इंडिया गेट को अनगिनत गाड़ियों ने घेर लिया. ढोल, नगाड़े, पटाखे, भारतीय झंडे और झूमते हुए लोगों ने एक दूसरे को गले लगाकर अपनी ख़ुशी का इज़हार किया.

बारी बारी से सबने नारा लगाया, ‘भारत माता की!’, तो जयकारे की गूंज ने मानो उस पहाड़ से इंडिया गेट को हिला दिया हो. फिर वन्दे मातरम के नारे लगाते हुए सभी ने इंडिया गेट को सलामी दी.

और तो और वहां मौजूद सुरक्षाकर्मी और पुलिस भी ख़ुद को इस जश्न में शामिल होने से रोक नहीं पाए.

आतिशबाज़ी की फुलवारियों ने इंडिया गेट को आलोकित कर दिया. इस साल की दीपावाली तो कई महीने पहले ही मना ली गई.

ऐसा लगता था जैसे वहां न तो कोई अमीर है और न ग़रीब...इस जीत का ख़ज़ाना पाकर सभी लोग ख़ुद को राजा मान रहे थे.

वहां न तो कोई बच्चा था, न बूढ़ा...दिल से तो सभी जवान नज़र आ रहे थे.

वहां न तो कोई हिंदू था, न मुसलमान, न ईसाई और न ही कोई सिख...सबका मज़हब तो क्रिकेट ही था.

भारत की इस ऐतिहासिक जीत पर तो दिल्ली की सड़कें भी चीख़ चीख़ कर भारत में अनेकता में एकता का ऐलान कर रही थी.

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