लीबिया पर ओबामा की दोहरी लड़ाई

 ओबामा इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption ओबामा को लीबिया में लड़ाई भी लड़ना है और अमरीकी जनता के आशंकाओं का हल भी करना है.

बुधवार से लीबिया के ख़िलाफ़ 'नो फ्लाई ज़ोन' को लागू करने की ज़िम्मेदारी अमरीका ने नेटो के हवाले कर दी है.

इसकी घोषणा राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सोमवार को देश के नाम एक संदेश में की थी. तो क्या इसका मतलब यह हुआ कि अब अमरीका लीबिया के मामले में किनारे हो गया है ? क्या इसकी भूमिका ख़त्म या कम हो गई है? क्या अमरीका नेटो को केवल सैन्य सहायता ही देगा जैसा की राष्ट्रपति ने अपने भाषण में कहा ? तीनों सवालों का जवाब आसान होगा,नहीं.

यहाँ विशेषज्ञ मानते हैं कि सैन्य रूप से नेटो का दूसरा नाम अमरीका है. अमरीका नेटो का सब से शक्तिशाली देश तो है ही साथ ही इसके पास लीबिया के ख़िलाफ़ सब से अधिक खु़फ़िया जानकारी भी है. अमरीकी मीडिया यह ख़बर चला रही है कि राष्ट्रपति ओबामा ने ख़ुफ़िया एजेंसी सी आई ऐ को हुक्म दिया है की वो लीबिया मे बाग़ी नेताओं से संपर्क करे और ज़रुरत पड़ने पर उन्हें हथियार भी दे.

इस ख़बर से पहले यह चर्चा आम थी कि लीबिया के अंदर सी आई ऐ एजेंट कई हफ़्तों से काम कर रहे हैं. यह ख़बर इस बात का प्रमाण भी है कि अमरीका अब भी लीबिया में पूरी तरह से संलिप्त है. दूसरी तरफ़ अमरीका के पास जो उच्च स्तर के हथियार हैं नेटो के दूसरे सदस्य देशों के पास नहीं हैं.

घरेलू मोर्चा

नासिर अल जवाद वाशिंगटन में मध्य पूर्व मामलों के विशेषज्ञ हैं और उनका कहना है कि अमरीका लीबिया में संलिप्त है और रहेगा.

नासिर अल जवाद ने कहा "अमरीकी राष्ट्रपति ने अपने भाषण में कहा की लीबिया में सत्ता परिवर्तन का लक्ष्य एक ग़लती होगी. लेकिन दूसरी तरफ़ यह भी कहा कि कर्नल मुअम्मर गद्दाफ़ी का सत्ता में बने रहना ठीक नहीं. सत्ता परिवर्तन ही अमरीका और नेटो का एक मात्र बड़ा उद्देश है." तो क्या ओबामा ने अपने भाषण में अपने देश वासियों को गुमराह करने की कोशिश की ?

दरअसल राष्ट्रपति को लीबिया के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई करने के समर्थकों और इसका विरोध करने वालों की आलोचना का सामना करना पड़ रहा है.

अफ़गानिस्तान और इराक़ के बाद अमरीकी जनता किसी और देश में सैन्य कार्रवाई से घबराती हैं. इसीलिए लीबिया के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई का विरोध करने वालों की संख्या ज़्यादा है. छद्म युद्ध

शायद इसीलिए राष्ट्रपति को देश के नाम संदेश में अमरीका की भूमिका को ठीक तरह से समझाने की ज़रुरत पड़ी. राष्ट्रपति ने इराक़ की मिसाल देते हुए कहा की वहाँ सत्ता परिवर्तन के चक्कर में आठ साल लग गए जिसके दौरान हज़ारों अमरीकी और इराक़ी सैनिक मारे गए. वो साफ़ तौर पर गद्दाफ़ी को सत्ता से हटाने पर ज़ोर नहीं दे रहे हैं लेकिन ज़मीन पर अमरीकी गतिविधयों से साफ़ लगता है की अमरीका और नेटो के सभी सदस्य देशों का असल उद्देश गद्दाफ़ी को सत्ता से हटाना है.

लेकिन राष्ट्रपति अमरीकियों को यह बात समझाने में शायद सफल नहीं हो सके.

ओबामा अब लीबिया के नेता के ख़िलाफ़ ख़ुफ़िया कार्रवाई पर अधिक ज़ोर दे रहे हैं.

संबंधित समाचार