अफ़गानिस्तान पर अमरीका की नई चिंता

मज़ार-ए-शरीफ़ इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption मज़ार-ए-शरीफ़ की सुरक्षा जुलाई से अफ़गान सेना और पुलिस के हाथ आ जाएगी.

अफ़गानिस्तान के शहर मज़ार-ए-शरीफ़ में संयुक्त राष्ट्र की एक इमारत पर हुए हमले में 12 लोग मारे गए जिन में प्रदर्शनकारी और संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारी भी शामिल थे.

अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की-मून ने हिंसा की इस वारदात की कड़ी आलोचना की है.

प्रदर्शनकारी अमरीका के फ़्लोरिडा राज्य के एक गिरजाघर में कुरान की एक प्रति जलाए जाने का विरोध कर रहे थे. इस तरह के प्रदर्शन की ख़बरें अफ़गानिस्तान के दूसरे शहरों से भी आई हैं. इस घटना ने अमरीकी प्रशासन को चिंता में डाल दिया है.

प्रदर्शनकारियों के 'शैतान अमरीका' और 'अमरीका मुर्दाबाद' जैसे नारों की आवाज़ भी अमरीकियों को पसंद नहीं आई होगी. और अब प्रशासन को इस बात का डर है की कहीं ये विरोध सारे अफ़गानिस्तान में और उसके बाद दुसरे मुस्लिम देशों में न फैल जाए.

यह घटना अमरीका के लिए सही समय पर नहीं घटी है. मज़ार-ए-शरीफ उन शांतिपूर्वक शहरों में से एक है जिसे अमरीकी सेना अफ़गानिस्तान प्रशासन के हवाले करने जा रही है. ये सिलसिला इस साल जुलाई से शुरू होगा और 2014 तक ख़त्म हो जाएगा.

लेकिन हिंसा के भड़कने के बाद अमरीकी प्रशासन के आलोचक यह सवाल उठा रहे हैं की क्या अमरीका के चले जाने के बाद अफ़गानिस्तान में शांति रहेगी. क्या अल-क़ायदा और तालिबान के लोग एक बार फिर हावी होने की कोशिश करेंगे?

पादरी की हरकत पर बवाल

इमेज कॉपीरइट AP
Image caption मज़ार-ए-शरीफ़ में एक घायल को ले जाते कुछ लोग.

अमरीकी प्रशासन के पास इन सवालों का जवाब नहीं. हाँ, मज़ार-ए-शरीफ़ के अधिकारियों ने ये ज़रूर कहा की हिंसा की इस कारवाई में तालिबान का हाथ था. शायद इसमें थोड़ी सच्चाई हो क्योंकि कुरान को जलाने वाले फ्लोरिडा के पादरी ने यह हरकत 20 मार्च को की थी और अफ़गानिस्तान में इस पर प्रदर्शन एक अप्रैल को हुए.

सूचना ये है की जुमे की नामाज़ के बीच मज़ार-ए-शरीफ की जामा मस्जिद के पेश इमाम ने लोगों को भड़काया. लेकिन ये भी संभव है की संयुक्त राष्ट्र के दफ्तर पर हमले की योजना पहले से बनायी गई हो. अगर कुरान को जलाने के मामले ने तूल पकड़ा तो इसकी शायद एक और वजह ये हो सकती है की अमरीका इस पादरी के ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई नहीं कर सकता.

मुस्लिम जगत का गुस्सा शायद पादरी की गिरफ्तारी से ठंडा हो जाता लेकिन क्यूंकि इस पादरी ने कुरन को जला कर अपने देश के क़ानून का उल्लंघन नहीं किया है इसलिए उसके ख़िलाफ़ कोई कारवाई नहीं की जाएगी. यहाँ वॉशिंगटन में कुछ लोगों का मानना है की अगर राष्ट्रपति ओबामा प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ कड़ी आलोचना में पादरी को लपेट लेते तो इस से अफ़गानिस्तान और दुसरे मुस्लिम देशों में सही पैग़ाम जाता. केवल इस्लामाबाद में अमरीकी दूतावास का पादरी की हरकत का खंडन करना इन विशेषज्ञों के मुताबिक नाकाफ़ी है.

संबंधित समाचार