यमन पर क्यों है अमरीका चुप

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Image caption यमन में राष्ट्रपति अली अब्दुल्लाह सालेह के ख़िलाफ़ प्रदर्शन जारी हैं

यमन में राष्ट्रपति अली अब्दुल्लाह सालेह के ख़िलाफ़ हो रहे प्रदर्शनों में कितने ही लोग मारे जा चुके हैं और सैकड़ों घायल हुए हैं.

लेकिन पश्चिमी देश राष्ट्रपति सालेह पर उस तरह का दबाव नहीं डाल रहे जैसा उन्होने मिस्र या ट्यूनीशिया में डाला था या जिस तरह लीबिया के नेता करनल गद्दाफ़ी पर डाला जा रहा है.

तो सवाल ये उठाया जा रहा है कि वो क्यों चुप्पी साधे बैठे हैं.

इसका मुख्य कारण ये है कि यमन के राष्ट्रपति अली अब्दुल्लाह सालेह आतंकवाद के ख़िलाफ़ चल रही लड़ाई में अमरीका के एक प्रमुख सहयोगी रहे हैं.

यमन अल-क़ायदा का एक ख़तरनाक गढ़ माना जाता है. अगर यमन की सरकार का नियंत्रण ढीला पड़ता है तो अल क़ायदा को अरब प्रायद्वीप में फैलने का मौक़ा मिल जाएगा.

लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात ये है कि यमन का इलाक़ा सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है.

अगर यमन की सरकार निष्फल हो जाती है तो सुएज़ नहर से आने जाने वाले समुद्री मार्ग पर अमरीका के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है.

इसीलिए अमरीका ने अभी तक ऐसा क़दम नहीं उठाया जिससे अली अब्दुल्लाह सालेह के हाथ कमज़ोर पड़ें.

उसे आशा थी कि किसी तरह की अंतरिम व्यवस्था से लोग शांत हो जाएंगे. लेकिन हिंसा के बढ़ने और राष्ट्रपति के सत्ता छोड़ने से इंकार की वजह से अमरीका की सोच में बदलाव आ रहा है.

इसकी एक वजह ये भी है कि यमन का विपक्ष बहुपक्षीय है. एक तरफ़ तो इसमें छात्र हैं, शिक्षक हैं, मध्यवर्ग के शहरी हैं और दूसरी तरफ़ क़बाइली हैं, जिहादी और पृथक्तावादी हैं.

इसलिए ख़तरा ये है कि राष्ट्रपति सालेह के जाने के बाद जो भी आएगा वो शायद देख को विखंडित होने से न बचा पाए.

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