इतिहास के पन्नों से

  • 10 अप्रैल 2011

इतिहास के पन्नों में दस अप्रैल के दिन घटी प्रमुख घटनाएं.

1995: मोरारजी देसाई का देहांत

मोरारजी देसाई
Image caption मोरारजी देसाई भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री थे जो कांग्रेस पार्टी से नहीं थे.

भारत के चौथे प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई का 10 अप्रैल 1995 में देहांत हो गया था. मोरारजी देसाई 1977 से 1979 तक भारत के प्रधानमंत्री के पद पर बने रहे. 1977 में इंदिरा गांधी की सरकार गिरने के बाद वे भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बने, जो राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का हिस्सा नहीं थे.

मोरारजी देसाई को महात्मा गांधी के साथ स्वतंत्रता संघर्ष में उनकी भूमिका के लिए याद किया जाता है. 1930 और 1940 के बीच उन्होंने कम से कम दस साल ब्रितानी जेल में काटे.

साथ ही उन्हें ‘मूत्र थेरेपी’ के लिए जाना जाता है. उनका ऐसा मानना था कि अपना ही मूत्र पीने से बवासीर से निजात पाया जा सकता है. उन्होंने इस थेरेपी का खुले रुप से प्रचार भी किया.

वे पहले ऐसे भारतीय हैं जिन्हें भारत और पाकिस्तान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाज़ा गया था.

1972: ईरान में भूकंप, हज़ारों की मौत

Image caption इस भूकंप में 4000 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.

10 अप्रैल 1972 को दक्षिणी ईरान में आए भीषण भूकंप में कम से कम 4,000 लोग मारे गए थे.

इस भूकंप का केंद्र घिर नाम के शहर में था, जो लगभग पूरी तरह से तबाह हो गया था. इस भीषण भूकंप के बाद भी पूरे दिन दक्षिणी ईरान में भूकंप के झटके महसूस किए गए, जिससे पूरे क्षेत्र में खलबली मच गई थी.

ऐसा माना जाता है कि मरने वालों में ज़्यादातर महिलाएं और बच्चे थे.

तेहरान विश्वविद्यालय के मुताबिक़ रिक्टर पैमाने पर इस भूकंप की तीव्रता 7.1 थी, जो ईरान के इतिहास का सबसे भयंकर भूकंप था.

1858: बिग बेन की विशाल घंटी लगाई गई

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Image caption इस महान घंटे ने सबसे पहले 1859 में समय बताना शुरू किया था.

दस अप्रैल 1858 के दिन लंदन में स्थित बिग बेन घड़ी की 14 टन की विशालकाय घंटी लगाई गई थी.

बिग बेन ब्रितानी इतिहास के धरोहर का प्रतीक है और लंदन के वेस्टमिनिस्टर पैलेस के सेंट स्टीफ़ेन्स टॉवर पर स्थित है.

बिग बेन के साथ दिलचस्प इतिहास जुड़ा हुआ है. इस महान घंटे ने सबसे पहले 1859 में समय बताना शुरू किया था.

जिस समय इस घंटे का निर्माण हुआ था तब निर्माण कार्यों के आयुक्त सर बेंजामिन हॉल थे और उन्होंने क़रीब 13 हज़ार 760 किलोग्राम वज़न वाले एक घंटे का निर्माण किया था, और बस उसी की तर्ज़ पर इस घंटे का नाम रखा गया.

सेंट स्टीफ़ेन्स टॉवर पर लगे इस घंटे पर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जर्मन सेनाओं ने दर्जन भर हमले किए थे लेकिन यह अपनी जगह यूँ ही खड़ा रहा.

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