ममता बनाम लेफ़्ट फ्रंट

  • 16 अप्रैल 2011
ममता बनर्जी इमेज कॉपीरइट BBC World Service

पश्चिम बंगाल में सोमवार से राज्य विधान सभा चुनावों की शुरुआत होने जा रही है.

सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी के लिए सत्ता में एक लंबे समय तक बना रहना ही उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी कही जा रही है.

पश्चिम बंगाल में 21 जून, 1977 को लेफ़्ट फ्रंट ने सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ली थी और सत्ता में लगतार बने रहते हुए इसे 34 साल पूरे होने को आ गए हैं.

इस उपलब्धि के साथ ही पश्चिम बंगाल में लेफ़्ट फ्रंट की सरकार ने लोकतांत्रिक तरीक़े से सत्ता में बनी रहने वाली सबसे लम्बी कम्युनिस्ट सरकार का रिकार्ड भी बनाया है.

लेकिन आगामी चुनावों में इसी बात को इस पार्टी की सबसे बड़ी कमज़ोरी भी बताया जा रहा है.

राजनीतिक विश्लेषकों की मानी जाए तो पूरे राज्य में एक सत्ता विरोधी लहर दौड़ रही जो सत्ताधारी सीपीआई-एम की गले की फाँस बन गई है.

हालांकि मार्क्सवादी नेताओं ने 2009 के लोक सभा चुनावों में मिले करारे झटके के बाद इस लहर का रुख़ मोड़ने की कोशिश की है पर इसे 'देर से जागने वाला' क़दम बताया जा रहा है.

एयरपोर्ट से कोलकाता शहर के बीच तक के सफ़र में मेरे टैक्सी ड्राइवर ने माना कि सत्ताधारी लेफ़्ट फ्रंट अब कुछ समझदारी के क़दम उठा रही है. लेकिन साथ में उसका सवाल भी था कि क्या इस सबसे पिछले 34 सालों में बरती गई ढिलाई की भरपाई हो सकेगी? कठिन परिस्थितियाँ

पश्चिम बंगाल में लेफ़्ट फ्रंट सरकार को प्रभावित कर रहे और भी कई मुद्दे हैं.

पार्टी ने ख़ुद ही 2009 में जारी किए गए एक पार्टी दस्तावेज़ में इन मुद्दों को उठाया है. पार्टी नेतृत्व ने इस बात को स्वीकार किया है कि उनके परंपरागत वोटर अब उनकी नीतियों से विमुख हो रहें हैं.

सिंगूर और नंदीग्राम जैसे ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले मतदाता इसलिए खिसक रहें हैं क्योंकि राज्य सरकार ने आधुनिकिकरण के नाम पर इन इलाक़ों में खेती वाली ज़मीनों का अधिग्रहण किया है.

रिपोर्टों में ये भी कहा गया है कि नंदीग्राम में राज्य सरकार की कथित शह पर शुरू हुई हिंसा में क़रीब 100 लोगों की मौत भी हो चुकी है.

कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी की सेंट्रल कमिटी ने 2009 के लोक सभा चुनावों के बाद की समीक्षा में कहा था, "तृणमूल कांग्रेस ने इसी मुद्दे को उठाकर इसका इस्तमाल सीपीआई-एम और उसके मतदाताओं के बीच दूरी बढ़ाने के लिए किया."

पार्टी का कहना था "लोक सभा चुनावी नतीजों से पता चला है ममता बनर्जी की पार्टी को इस मामले में सफलता मिली है. दक्षिण और उत्तर परगना, पूर्वी मिदनापुर, हावड़ा और नादिया जैस ज़िलों में सीपीआई-एम एक भी सीट जीतने में नाकाम रही."

मुस्लिम मतदाता

सत्ताधारी पार्टी के समक्ष मुस्लिम मतदाताओं को अपने ख़ेमे में बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन कर उभरा है.

पिछले चुनावी नतीजों और अल्पसंख्यक बहुल इलाक़ों का आंकलन करने के बाद पता चलता है कि कुल 294 सीटों में से 75 से 77 सीटें ऐसी हैं जहां उन्हीं की जीत की संभावना हैं जिन्हें मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन मिलेगा.

इन चुनावों में ऐसा भी कहा जा रहा है कि एक लंबे समय तक लेफ़्ट का समर्थन करते रहने के बाद अब ज़्यादातर मुस्लिम मतदाताओं ने अपना समर्थन बंद कर दिया है.

साथ ही लेफ़्ट पार्टी के अपने धड़ों में और ख़ासतौर से एसऍफ़आई जैसे छात्र संगठनों में अब मनमुटाव ख़ुल कर सामने आने लगे है. कम से कम पश्चिम बंगाल में इस तरह की बातें पिछले तीस सालों में न तो सुनी गई थीं न ही देखी गई थी.

नेताओं की बेरुख़ी

पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिवेश में सत्ताधारी वाम नेताओं के जनता को नज़रंदाज़ करने वाले रवैये की भी आगामी चुनावों में एक अहम भूमिका रहेगी.

मिसाल के तौर पर 2007 में हुई एक प्रेस वार्ता में मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य ने एक पत्रकार को धमकाते हुए कहा, "मैं आपके अखब़ार को बंद करवा सकता हूँ. पर मैं ऐसा इसलिए नहीं करूंगा क्योंकि उससे मेरे ही हाथ मैले हो जाएंगे."

इस घटना के बाद से ही बिनोय कुमार, अनिल बासु या पार्टी के राज्य सचिव बिमान बोस जैसे दिग्गज नेताओं ने विपक्षी पार्टियों के ख़िलाफ़ कई बार अभद्र भाषा का प्रयोग किया है.

हालांकि ममता बनर्जी भी अपने ग़ुस्से के साथ साथ अपनी तीख़ी टिप्पणियों के लिए भी चर्चा में रहती हैं लेकिन वे विपक्ष के नाम पर अभी तक किसी ख़ास घेरे में नहीं आई हैं.

ममता फ़ैक्टर

तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी ने अपने करिश्मे से वाम नेताओं की नीदें उड़ा रखी हैं.

एकजुट विपक्ष की एकमात्र नेता बन कर उभरी ममता बनर्जी को लेकर गावों और शहरों में काम करने वालों में बराबर का उत्साह है.

हालांकि हाल फ़िलहाल की कुछ गतिविधियाँ इस ओर भी इशारा करती हैं कि चुनाव लड़ने को इच्छुक कुछ लोग टिकट न मिल पाने कि वजह से तृणमूल और कांग्रेस से नाराज़ हैं.

इन व्यक्तियों ने ममता और कांग्रेस गठबंधन के ख़िलाफ़ निर्दलीय उमीदवार बन मैदान में उतरना शुरू कर दिया है.

ममता बनर्जी की पार्टी के ख़िलाफ़ माओवादियों के दिए गए फ़रमान भी उन इलाक़ों में वोट काट सकते हैं जो झारखंड राज्य से सटे हुए हैं.

लेकिन अगर ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ कहीं जा रही सभी बातें सच भी हो जाती हैं तब भी लेफ्ट फ्रंट का इन चुनावों में जीतना बहुत मुश्किल लग रहा है.

अगर बुद्धदेब भट्टाचार्य के नेतृत्व में वाम दल चुनाव जीत गया तो पश्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास में ये सबसे महत्त्वपूर्ण घटना कही जाएगी.

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