'जान बचाएं या चुनाव लड़ें ?'

इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption बिहार के पंचायती चुनाव पर माओवादियों की धमकी का असर

बिहार में 20 अप्रैल से शुरू हो रहे पंचायती चुनाव पर माओवादी खौफ़ गहराने लगा है.

राज्य के गया और औरंगाबाद ज़िलों में डर के मारे बहुत से उम्मीदवारों ने अपनी नामज़दगी के पर्चे वापस ले लिए हैं.

इन दोनों ज़िलों में ख़ासा असर रखने वाले माओवादी संगठन (सीपीआई -माओइस्ट) ने चुनाव के बहिष्कार का ऐलान किया है.

उसने अपने प्रभाव वाले इलाक़ों में बैठकें करके, दीवारों पर लिखकर या पर्चे चिपकाकर ये चेतावनी दी है कि जो मतदाता या उम्मीदवार इस चुनाव में हिस्सा लेगा वह ख़ूनी नतीजा भुगतने को तैयार रहे.

इस हिंसक नक्सली तेवर से भयभीत चुनावी उम्मीदवारों द्वारा नामांकन-वापसी के चौंकाने वाले आंकड़े ख़ासकर दो प्रखंडों में सामने आये हैं.

एक है गया ज़िले का डुमरिया प्रखंड और दूसरा है औरंगाबाद ज़िले का देव प्रखंड.

इन दोनों प्रखंडों में कुल मिलाकर 300 के क़रीब ऐसे प्रत्याशी हैं जिन्होंने मुखिया या सरपंच समेत विभिन्न पदों से अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली.

जानकार बताते हैं कि इतनी बड़ी तादाद में पहले किसी भी चुनाव में इस इलाक़े के प्रत्याशियों ने नामांकन-पत्र वापस नहीं लिए थे.

दहशत का माहौल

दहशत का ऐसा माहौल बन गया है कि डुमरिया प्रखंड की काचर और भंगिया पंचायतों में इसबार किसी ने भी पंचायत के किसी पद केलिए उम्मीदवारी के पर्चे नहीं भरे.

इन डरे हुए लोगों में से कुछ ने साहस करके मीडिया में बयान दिया कि राज्य सरकार की तरफ़ से अगर जानमाल की सुरक्षा संबंधी गारन्टी का भरोसा होता तो उम्मीदवार इस तरह मैदान छोड़ के नहीं भागते.

एक माओवादी प्रवक्ता ने इस विषय में टेलीफोन करके बीबीसी से कहा '' घूसखोर भ्रष्ट तंत्र के इस चुनावी ढकोसले का बहिष्कार हम इसलिए करते हैं क्योंकि ये तमाम सरकारी अमले ग़रीबों का हक़ मारकर ऐश-मौज करने को ही लोकतंत्र समझते हैं.''

लेकिन राज्य का पुलिस प्रशासन इस बात को नहीं मानता कि जनसुरक्षा या ज़मीनी विकास के अभाव में माओवादियों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है.

पुलिस प्रमुख नीलमणि ने कहा है, '' इसबार गड़बड़ी या ग़ैरक़ानूनी हरकत करते पाए जाने वालों को बर्बाद कर दिया जायेगा. अगर ऐसे अपराधी तत्व सर उठाएंगे तो उन्हें कुचल दिया जायेगा. उपद्रवियों को भगाने के लिए हवाई फ़ायरिंग नहीं बल्कि निशाना बना कर फ़ायरिंग की जाएगी.''

डीजीपी के इस बयान पर विपक्षी नेताओं को व्यंग्य करने का मौक़ा मिल गया. उन्होने कहा कि लगभग पूरे बिहार में माओवादियों का विस्तार होते देखकर भी पुलिस कुछ नहीं कर पाने की खीज निकाल रही है.

दूसरी तरफ़ राज्य के गृह सचिव आमिर सुबहानी ने कहा है कि गया और औरंगाबाद ज़िलों में चुनावी उम्मीदवारों की नाम-वापसी को किसी नक्सली खौफ़ से जोड़ना सही नहीं लगता.

उनके मुताबिक़ ऐसा लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के तहत ही हुआ होगा क्योंकि माओवादी धमकी जैसी शिकायत किसी ने दर्ज नहीं कराई है.

संबंधित समाचार