अमरीका में फैला इस्लामी चरमपंथ

  • 19 अप्रैल 2011
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Image caption उमर हम्मामी सोमालिया के चरमपंथी संगठन अल शहाब में बड़े पद पर हैं.

अमरीका में 11 सितंबर की घटना के बाद लोगों को लगता था कि इस्लामी चरमपंथ विदेशों से आने वाली समस्या है लेकिन हाल की घटनाएं दर्शाती हैं कि इस्लामी चरमपंथ अमरीका की घरेलू समस्या बनता जा रहा है.

अमरीका के सामने अब ये सवाल सबसे बड़ा है कि कैसे मुस्लिम प्रवासियों को कट्टरपंथ से बचाया जाए या उन्हें कट्टरपंथी होने से रोका जाए.

अमरीका का एरिज़ोना इलाक़ा वो आखिरी स्थान होगा जहां के बारे में सोचा भी जा सके कि यहां इस्लामी चरमपंथ पनपेगा.

उमर हम्मामी यहीं पैदा हुए और पले बढ़े. चर्च जाने वाले एक ईसाई के रुप में. इसी जगह उन्होंने अपना धर्म छोड़ा और इस्लाम अपनाया...कट्टर इस्लाम.

अब हम्मामी सोमालिया में कट्टर इस्लामी संगठन अल शबाब में एक बड़े पद पर हैं.

हम्मामी अपने जीवन में चरमपंथी बन जाएंगे शायद ही किसी ने सोचा था.

हम्मामी के स्कूल के दोस्त जेम्स कल्वेहाउस बताते हैं, ‘‘ उनके पिता सीरियाई थे एक सुन्नी मुसलमान. उनकी मां ईसाई. वो अपनी मां के साथ वो चर्च जाता था और बड़ा ही मिलनसार था.’’

उमर हम्मामी अपने स्कूल में लोकप्रिय थे और स्कूल के प्रेसिडेंट भी बने.

चीज़ें तब बदलनी शुरु हुईं जब किशोरवय हम्मामी पहली बार सीरिया गए.

पहचान का संकट

कल्वेहाउस बताते हैं, ‘‘ हम साथ में गए थे छुट्टियां मनाने. हमने पाया कि हम अमरीकी नहीं हैं. हमारा एक दूसरा पक्ष भी हैं. उमर ने पढ़ना शुरु किया. खूब पढ़ने पर उसने ये पाया कि वो मुसलमान होना चाहता है. तब उसकी उम्र 15 साल थी.’’

धीरे धीरे हम्मामी न केवल मुसलमान हो गए बल्कि इस्लाम के कठिन नियमों का पालन करने लगे. अपने पिता से भी अधिक वो इस्लाम के नियमों की बात करने लगे.

बाद में हम्मामी और कल्वेहाउस कनाडा चले गए जहां बड़ी संख्या में सोमालिया के लोग रहते हैं.

कनाडा आकर हम्मामी का रुख राजनीतिक हो गया और फिर वो जिहादी बन गए.

जो हम्मामी के साथ हुआ वो अमरीका के लिए चौंकाने वाला था क्योंकि इस्लामी चरमपंथ अब अमरीका के लिए घरेलू समस्या बन चुका था जिसे वो अब तक यूरोपीय समस्या समझते रहे थे.

पिछले कुछ वर्षों में मिनेसोटा में रह रहे हज़ारों सोमालियाई युवक सोमालिया चले गए और वहां उन्होंने अमरीका के ख़िलाफ़ युद्ध में हिस्सा लिया.

एडम गदैहन कैलिफोर्निया में पले बढ़े लेकिन अब वो पाकिस्तान में अल क़ायदा का पक्ष रखते हैं. फैसल शहज़ाद ने न्यूयॉर्क के टाइम्स स्कवायर पर बम रखने से पहले दस साल अमरीका में बिताए.

मेजर निदाल हसन वर्जिनिया में जन्मे, डॉक्टर बने और फिर अमरीकी सैनिक बने. अब उन पर 13 लोगों की हत्याओं का मामला चल रहा है.

Image caption कल्वेहाउस ने भी इस्लाम कबूला लेकिन जिहादी नही बने.

लंदन के किंग्स कॉलेज में इंटरनेशनल सेंटर फॉर रैडिकलाइजेशन के निदेशक पीटर न्यूमान इस समय वाशिंगटन में रहते हैं.

वो कहते हैं, ‘‘ अब तक अल क़ायदा विदेशी समस्या थी लेकिन अब अल क़ायदा घरेलू समस्या बन गई है. ये सवाल पैदा करता है कि अमरीका में कुछ समुदायों के साथ कैसा बर्ताव होना चाहिए. अमरीका में पहले ऐसा नहीं हुआ है.’’

अमरीका में रह रहे मुसलमानों के अनुभव बिल्कुल अलग अलग हैं.

पेन स्टेट यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ टेररिज़्म की फेलो मिया ब्लूम कहती हैं कि सोमालिया और पाकिस्तानी प्रवासियों के उदाहरण बिल्कुल अलग अलग हैं.

सोमालिया के लोग मूलत: शरणार्थी रुप में आते हैं जबकि पाकिस्तानी लोगों का समुदाय यहां पहले से हैं. लोग आते हैं और उस समुदाय का हिस्सा बनते जाते हैं.

अमरीका में मुस्लिम प्रवासियों और कट्टरपंथ इस्लाम को लेकर बहस अब ज़ोर पकड़ रही है. ग्यारह सितंबर के हमले की जगह मस्जिद बनाने को लेकर भी काफ़ी बवाल हो चुका है.

हालांकि अभी भी अमरीकी समाज के तौर तरीकों और अपने में लोगों को मिलाने वाले इस समाज के सामाजिक ढांचे पर बहस नहीं हो रही है.

जेम्स कल्वेहाउस ने भी इस्लाम कबूला है और उनके पास अपने तर्क है कट्टरपंथ को लेकर.

वो कहते हैं, ‘‘ यह पहली पीढ़ी के प्रवासी नहीं हैं. वो लड़ने नहीं जा रहे हैं और न ही ये धार्मिक मान्यता वाले लोगों के बच्चे ही हैं. ’’

कल्वेहाउस के अनुसार ये वो लोग हैं जिनकी पैदाइश सेकुलर या धर्मों को नहीं मानने वाले परिवारों में हुई हैं. ऐसे घरों के बच्चे बड़े होकर पहचान के संकट से जूझते हैं. पहचान तलाश करते हैं और उन्हें कट्टरपंथी इस्लाम में एक पहचान मिलती है.

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