कैसे बनती थी अदृश्य स्याही

  • 21 अप्रैल 2011
पैरों के नाखून
Image caption जारी किए गए दस्तावेज़ लगभग सौ साल पुराने हैं.

पहले विश्व युद्ध के दौरान जासूस अपने पैरों के नाखूनों पर गढ़ कर संदेश लिखते थे और अदृश्य शब्द लिखने के लिए नींबू के रस का इस्तेमाल किया करते थे.

अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए के गुप्त दस्तावेज़ सार्वजनिक किए जाने के बाद ये जानकारी सामने आई है.ये कागज़ात किसी ख़ुफ़िया एजेंसी के पास रखे गए सबसे पुराने गुप्त दस्तावेज़ों में से एक हैं.

लगभग सौ साल पुराने इन छह दस्तावेज़ों में जासूसी की कई तकनीकों का उल्लेख किया गया है.सीआईए का कहना है कि तकनीकि तरक्की की वजह ने इन दस्तावेज़ों को जारी करना मुमकिन हो पाया है.

एक दस्तावेज़ में लिखा है कि रुमाल को नाईट्रेट, सोडा और स्टार्च में भिगोने से अदृश्य स्याही बनाई जा सकती है. इस रुमाल को पानी में डालने से एक ऐसा घोल निकलता है जिससे गोपनीय संदेश लिखे जा सकते हैं.

1914 में फ़्रांस में लिखे गए एक दस्तावेज़ में जर्मनी के उस फ़ॉर्म्यूले का उल्लेख है जिससे अदृश्य स्याही बनाई जा सकती है.

कैलिफ़ॉर्निया में हाथ की लिखाई के एक विशेषज्ञ ने ऐसा ज्ञापन बनाया था जिससे कि मनुष्य के शरीर पर न दिखाई देने वाले संदेशों की चित्रकला बनाने के चलन का संकेत मिलता है.

दस्तावेज़ों के मुताबिक़ इन अदृश्य संदेशों को प्रत्यक्ष बनाने के लिए रेजैन्ट नाम के रासायनिक पदार्थ को उस पर छिड़कने के बाद ऐटमाइज़र का प्रयोग किया जाता था.

दस्तावेज़ों में जासूसों और तस्करों द्वारा इस्तेमाल किए गए दूसरे तरीकों को लेकर भी चेतावनी दी गई है, जैसे कि पैरों के नाखूनों पर संदेश गढ़ना.

सीआईए ने पिछले साल 10 लाख से ज़्यादा ऐतिहासिक दस्तावेज़ जारी किए थे और ये दस्तावेज़ एजेंसी की वेबसाइट पर भी मौजूद है.

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