जैतापुर मामले पर राजनीति तेज़

शिवसेना

जैतापुर आणविक संयंत्र मामले पर राजनीति गरम हो गई है और शिव सेना ने इस मामले को एक बड़ा मुद्दा बना लिया है.

पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने भी जैतापुर का दौरा किया, लेकिन इसी बीच पार्टी पर मुद्दे का राजनीतिकरण करने के आरोप भी लग रहे हैं.

फ़याज़ नाड़ेकर प्रस्तावित जैतापुर संयंत्र के पास के गाँव नाटे के रहने वाले हैं. इसी गाँव में हुई हिंसा में दो दिन पहले एक व्यक्ति की मौत हो गई थी.

फ़याज़ कहते हैं, "अगर कोई पक्ष हमारा साथ देना चाहे, तो वो लिया जाएगा, चाहे वो भाजपा हो, शिवसेना हो, या फिर कांग्रेस. मगर ये आंदोलन यहाँ के किसानों, और मछुआरों के नेतृत्व में ही चलेगा और ये अहिंसा से ही चलेगा. ये मामला राजनीतिक नज़र आ रहा होगा, लेकिन हम इस मामले को राजनीतिक नहीं होने देंगे."

फ़याज़ का कहना है कि हालांकि आरोप लग रहे हैं कि शिव सेना जैतापुर आणविक संयंत्र मामले का राजनीतिकरण कर रही है, लेकिन यहाँ रहने वाले लोगों को सिर्फ़ सहयोग मिलने से मतलब है, चाहे वो कहीं से भी आए.

लेकिन इस पूरे गाँव, और साथ के सटे कई इलाकों में हर जगह शिव सेना के पोस्टर्स और बैनर्स लगे मिले.

स्पष्ट है कि शिवसेना इस आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रही है.

एक सोच ये है कि शिव सेना एक तीर से दो शिकार कर रही है, एक तरफ़ सरकार के लिए परेशानी खड़ी करना, दूसरी ओर शिव सेना के बड़े नेता रहे और अब कांग्रेस में जा चुके नारायण राणे से लोगों को खींचना.

नारायण राणे फ़ैक्टर

उद्वव ठाकरे के नेतृत्व से नाख़ुश नारायण राणे ने वर्ष 2005 में शिव सेना छोड़ी थी.

उस वक्त माना गया था कि ये शिव सेना के लिए ये बहुत बड़ा झटका था क्योंकि राणे की कोंकण इलाके में पकड़ है और माना जाता है कि वो कोंकण की कई सीटों को प्रभावित कर सकते हैं. वो अभी कांग्रेस-एनसीपी सरकार में उद्योग मंत्री हैं.

राणे ने पार्टी से निकलकर सात शिव सेना विधायकों को अपनी ओर खींच लिया था. वर्ष 2009 के विधानसभा चुनाव में कोंकण में शिव सेना की सीटें नौ से घटकर चार रह गई थीं.

इलाक़े में राणे की पकड़ को देखते हुए ही सरकार ने उन्हें लोगों को अपनी ओर खींचने का ज़िम्मा सौंपा था.

नाटे और पास के मुस्लिम बहुल इलाकों में लोग कहते हैं कि नारायण राणे जैसे कोंकण के नेता और कांग्रेस सरकार की ग़लतियों की वजह से ही शिव सेना को यहाँ अपना प्रभाव फ़ैलाने का मौक़ा मिला है. इस मुस्लिम बहुल इलाक़े में शिव सेना के कई सदस्य हैं.

उधर मछुआरों के नेता अमजद बोरकर की माने तो राजनीतिकरण और हिंसा से उनके आंदोलन को नुकसान पहुँचेगा. वो एनरॉन प्रोजेक्ट मुद्दे पर शिव सेना के कथित यू-टर्न का भी ज़िक्र करते हैं.

अमजद बोरकर कहते हैं, "शिव सेना और भाजपा ने सत्ता में आने से पहले घोषणा की थी कि हम एनरॉन को अरब सागर में डुबो देंगे. लेकिन सत्ता में आने के बाद मामला बदल गया. य़े यहाँ नहीं होना चाहिए. जैतापुर का विरोध करने से पहले शिव सेना के बड़े नेता जैसे सुरेश प्रभु ने राज्य में बड़े प्रोजेक्टों को लाने की वकालत की थी."

अमजद बोरकर का मानना है कि जब नारायण राण के बेटे नीलेश राणे इस इलाके से संसद के लिए चुनाव लड़ रहे थे, तब उन्हें लोगों का भरपूर समर्थन मिला था, यहाँ तक की लोगों ने अपना काम छोड़कर नीलेश को वोट दिया था. लेकिन अब इतने महत्वपूर्ण वक्त उन्हें नारायण राणे की ओर से कोई मदद नहीं मिल रही है.

यहाँ लोगों को नारायण राणे के इस वक्तव्य से बहुत आपत्ति है कि बाहर वाले लोग उन्हें जैतापुर संयंत्र के बारे में भड़का रहे हैं.

'राजनीति नहीं चाहिए'

Image caption प्रकाश कुवलेकर,शिवसेना ताल्लुका प्रमुख

स्थानीय निवास डॉक्टर मिलिंद नारायण देसाई भी इस संयंत्र के खिलाफ़ मुखर स्वरों में से एक हैं.

वो कहते हैं, "मुझे भी पता है कि शिव सेना की भूमिका राजनीतिक है. हमने उद्धव ठाकरे को बता दिया है कि आप आएँ, या न आएँ, हम लड़ेंगें. अगर आप नहीं आएं, तब भी हम लड़ंगें."

उधर ताल्लुका राजापुर में स्थित शिव सेना कार्यालय में चहल-पहल है. शिव सेना ताल्लुका प्रमुख प्रकाश कुवलेकर चाहते हैं कि संयंत्र को रत्नागिरी से बाहर फेंक दिया जाए और इस मामले में शिव सेना की नीति कभी नहीं बदली है.

पास बैठे नेता प्रकाश लाड नारायण राणें का ज़िक्र सुनते ही भड़क उठते हैं.

प्रकाश कहते हैं, "नारायण राणे शिव सेना से ही पैदा हुए हैं. वो दुनिया से इस संयंत्र के बारे में झूठ बोलते हैं. ये कोंकण बहुत सुंदर है. सभी की नज़र इस पर है. जापान में जैसा हुआ है, वैसा यहाँ नहीं होना चाहिए."

अब सभी की निगाहें 23 मार्च से तारापुर संयंत्र से जैतापुर तक के आयोजित मार्च पर है जिससे यहां स्थिति फिर बदल सकती है.

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