आईएसआई को भंग करने का वक़्त

  • 10 मई 2011
Image caption ओसामा बिन लादेन

ग्यारह सितंबर के बाद अमरीका और पाकिस्तान के रिश्तों में अविश्वास की स्थिति पैदा हो गई थी, लेकिन दो मई को ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद ये रिश्ता टूटने की कगार पर पहुँच गया है.

ऐबटाबाद में हुए सैन्य अभियान के बारे में जो ताज़ा जानकारियां सामने आ रही हैं उससे अमरीका, पाकिस्तान और बाकी दुनिया में कई सवाल उठ रहे हैं जैसे कि इस अभियान के बारे में कौन क्या जानता था, किसने किसे बचाया और कई दशकों में विश्व के इस सबसे बड़े क़ामयाब खु़फ़िया ऑपरेशन के बारे में किसे अंधेरे में रखा गया.

चाहे मार्च 2003 में रावलपिंडी में हुई ख़ालिद शेख़ मोहम्मद की ग़िरफ़्तारी हो या मई 2005 में मरदान में हुई अबु फ़राज अल लीबी की ग़िरफ़्तारी, अल क़ायदा के इन दोनों ही शीर्ष नेताओं की ग़िरफ़्तारी से इस बात के संकेत मिले थे कि ये संगठन पाकिस्तान में सक्रिय है.

पहले अल क़ायदा नेताओं की ग़िरफ़्तारी को पाकिस्तान वैश्विक चरमपंथ के ख़िलाफ़ अभियान में कामयाबी के रूप में देखता था, लेकिन ओसामा बिन लादेन की हत्या की अमरीका की अकेली कार्रवाई ने पाकिस्तान की धरती पर चरमपंथ के ख़िलाफ़ लड़ाई में वॉशिंगटन और इस्लामाबाद के बीच की खाई को उजागर कर दिया है.

बदले समीकरण

Image caption जनरल अशफ़ाक़ परवेज़ कयानी

दशकों तक अमरीकी और पाकिस्तानी ख़ुफ़िया और सैन्य तंत्र अफ़गानिस्तान और अन्य जगहों पर रणनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए एक-दूसरे के साथ सहयोग करते रहे हैं, तकरार करते रहे हैं, दबाव डालते रहे हैं, नीतियों की निंदा और तारीफ़ करते रहे हैं.

लेकिन दो मई की घटना ने सारे समीकरण बदल दिए हैं.

हम शायद कभी भी पूरी तरह ये नहीं जान पाएंगे कि पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख अशफ़ाक़ परवेज़ कयानी, आईएसआई निदेशालय के प्रमुख लेफ़्टिनेंट जनरल अहमद शुजा पाशा या उनके शीर्ष सहयोगियों को ऐबटाबाद में बिन लादेन की मौजूदगी की जानकारी थी या नहीं.

अगर पाकिस्तान के सैन्य और ख़ुफ़िया तंत्र ने आधिकारिक तौर पर विश्व के सबसे बड़े चरमपंथी को पनाह दे रखी थी तो ये नहीं माना जा सकता कि पाकिस्तान और उसका राजनीतिक नेतृत्व इस्लामिक चरमपंथ को किसी न किसी रूप में बढ़ावा नहीं देता.

अगर हम ये मान लें कि सरकार की इजाज़त के बग़ैर पाकिस्तान की सैन्य प्रशिक्षण अकादमी से महज़ थोड़ी दूरी पर किसी शख़्स ने बिन लादेन को संरक्षण दे रखा था तो ये मान लेने में कोई मुश्किल नहीं होनी चाहिए कि बिन लादेन की हत्या के बाद पाकिस्तान के लिए अपनी धरती पर पनाह लिए हुए छोटे बिन लादेनों से निपटने का अब अनुकूल मौक़ा है.

साथ ही, अगर कयानी और उनके सैन्य प्रशासन को पाकिस्तान में कार्यरत चरमपंथियों का पता लगाने और उन्हें सज़ा देने में अतीत में कामयाबी नहीं मिली है तो अब अक्षमता का हवाला देकर पाकिस्तानी नेतृत्व अपनी ज़िम्मेदारियों से बच नहीं सकता है.

अमरीका की चेतावनी

2001 में अमरीका पर हुए हमले के बाद राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश और उनके सहयोगियों ने तत्कालीन पाकिस्तानी सेना प्रमुख परवेज़ मुशर्रफ़ से साफ़ शब्दों में कह दिया था कि या तो वे चरमपंथ का मुक़ाबला करने में अमरीका की मदद करें या फिर ख़ामियाज़ा भुगतने के लिए तैयार रहें. मुशर्रफ़ अमरीका की मदद को तैयार हो गए. कम से कम उन्होंने ये संकेत तो दिया ही कि वो इस दिशा में काम कर रहे हैं.

1998 में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने जब पाकिस्तान की सीमा के ऊपर से अफ़गानिस्तान पर क्रूज़ मिसाइल हमले के आदेश दिए तो मुशर्रफ़ के पूर्ववर्ती जहांगीर करामात को आख़िरी समय में इसकी जानकारी दी गई थी.

2011 में राष्ट्रपति बराक ओबामा ने वही किया जो उन्होंने ठीक समझा. उन्होंने अमरीका पर 9/11 के हमले के लिए ज़िम्मेदार समझे जानेवाले शख़्स के ख़िलाफ़ अभियान चलाने की अनुमति दे दी.

पाकिस्तान के पड़ोसी भारत और अफ़गानिस्तान लंबे समय से ये इशारा करते रहे हैं कि पाकिस्तान में चरमपंथ के अड्डे हैं और रावलपिंडी स्थित पाकिस्तान का सैन्य मुख्यालय इन्हें नज़रअंदाज़ करता आ रहा है.

भारत के सवाल

नवंबर 2008 में मुंबई पर हुए हमले के बाद भारत ने ये सवाल एक बार फिर उठाया और पूछा कि क्या पाकिस्तानी हुक्मरानों को मुंबई पर किए गए चरमपंथी हमलों की जानकारी थी?

आज अमरीका और बाकी विश्व एक ही जवाब चाहते हैं कि पाकिस्तानी नेतृत्व को देश में बिन लादेन की मौजूदगी की कितनी जानकारी थी?

ऐसे सवाल जितने बढ़ते जाएंगे, अमरीका को इस्लामाबाद के साथ अपने संबंधों पर दोबारा विचार करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बच जाएगा. अमरीका को ये मानना पड़ेगा कि उसके और पाकिस्तान के रणनीतिक लक्ष्य अलग-अलग हैं.

अगर आईएसआई प्रमुख अहमद शुजा पाशा का इस्तीफ़ा हो जाता है तो ये महज़ एक दिखावे की कार्रवाई ही होगी.

अगर कयानी और उनकी सेना वाक़ई सुधार की दिशा में काम करना चाहते हैं तो सबसे पहले उन्हें आईएसआई निदेशालय को भंग कर देना चाहिए और इसके अधिकारियों को बैरकों में वापस भेज देना चाहिए.

ये समस्या के हल की दिशा में एक सकारात्मक पहल होगी. कम से कम ये एक संकेत होगा कि पाकिस्तान में जेहादी प्रोजेक्ट को दी जाने वाली मदद अब वाक़ई अतीत की बात हो गई है.

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