कौमार्य परीक्षण 'बड़े पैमाने पर' हुआ था

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Image caption समाचारपत्र गार्डियन ने 1 फ़रवरी 1979 को पहली बार यह ख़बर प्रकाशित की थी

सत्तर के दशक में ब्रितानी वीज़ा प्रावधानों के तहत दक्षिण एशियाई महिलाओं के कौमार्य परीक्षण के मामले में नई जानकारियाँ सामने आई हैं, जिनसे पता चलता है कि पहले जितना समझा जा रहा था, यह मामला उससे कहीं अधिक बड़ा है.

फ़रवरी 1979 में हंगामे के बाद ब्रितानी सरकार ने कौमार्य जाँच पर रोक लगा दी थी, सरकार ने स्वीकार भी किया था कि ऐसे इक्का-दुक्के मामले हुए थे, लेकिन ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं के हाथ ऐसी फ़ाइलें लगी हैं जिनसे पता चलता है कि कम से कम 80 भारतीय महिलाओं को इस जाँच से गुज़रना पड़ा था.

इस मामले में अब माँग उठने लगी है कि ब्रितानी सरकार माफ़ी माँगे.

ब्रितानी नियमों के तहत 30 साल गुज़रने के बाद कोई भी सरकारी फ़ाइलों की प्रति निकाल सकता है, इसी के तहत ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं ने कई विभागों से कई दस्तावेज़ हासिल किए हैं.

इन दस्तावेज़ों से पता चलता है कि दक्षिण एशियाई देशों से शादी करके ब्रिटेन में बसने के लिए आने वाली महिलाओं का कौमार्य परीक्षण किए जाने की इक्का-दुक्का नहीं बल्कि कई घटनाएँ हुई थीं और एक तरह से यह सरकारी नीति का हिस्सा थी.

लंदन से छपने वाले अख़बार गार्डियन में एक ख़बर प्रकाशित होने के बाद फ़रवरी 1979 में ब्रितानी गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय ने इस पर रोक लगा दी थी.

गार्डियन में छपी ख़बर के मुताबिक़ लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट पर 1979 में एक भारतीय शिक्षिका का कौमार्य परीक्षण एक पुरुष डॉक्टर से करवाया गया था जिसके बाद काफ़ी हंगामा हुआ था.

एडिलेड यूनिवर्सिटी के लॉ डिपार्टमेंट के शोधकर्ता एवन स्मिथ ने बीबीसी से बातचीत में बताया कि उस समय सरकार ने एक-दो ही ऐसी घटनाओं की बात स्वीकार की थी लेकिन यह सच नहीं था.

स्मिथ ने कहा, "ब्रिटेन के विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय और प्रधानमंत्री के कार्यालय से हमने जो कागज़ात निकाले हैं उनसे यही पता चलता है कि 1970 के दशक में दिल्ली और मुंबई में, भारत में ऐसे 80 मामले हुए थे. हमारे पास पाकिस्तान और बांग्लादेश के आंकड़े नहीं हैं लेकिन इतना ज़रूर है कि यह मामला जितना समझा जा रहा था उससे काफ़ी बड़ा है."

'माफ़ी माँगे सरकार'

फ़रवरी 1979 में इस मामले के सामने आने पर ज्वाइंट काउंसिल ऑन वेलफ़ेयर ऑफ़ इमिग्रेंट्स (जेसीडब्ल्यूआई) ने इसका काफ़ी विरोध किया था.

1960 में गठित इस कल्याणकारी संस्था जेसीडब्ल्यूआई की क़ानूनी मामलों की निदेशक हिना माजिद ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा कि यह बहुत ही शर्मनाक मामला है जिस पर सरकार को औपचारिक रूप से माफ़ी माँगनी चाहिए.

वे कहती हैं, "हम चाहते हैं कि सरकार दक्षिण एशियाई युवतियों से औपचारिक तौर पर माफ़ी माँगे क्योंकि यह एक शर्मनाक और घृणित क़दम था, इस बात को आधिकारिक तौर पर स्वीकार करना चाहिए क्योंकि यह महिलाओं के प्रति, आप्रवासियों के प्रति और मानवाधिकारों के प्रति तिरस्कार की भावना को दिखाता है".

ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं का कहना है कि भारतीय महिलाओं के कौमार्य की मेडिकल जाँच की घटनाएँ दिल्ली और मुंबई स्थित ब्रितानी वीज़ा कार्यालयों में और कई बार उनके ब्रिटेन आने पर हीथ्रो एयरपोर्ट पर भी हुई थी.

यूके बॉर्डर एजेंसी जो अब आप्रवासियों से संबंधित मामलों की निगरानी करती है, उसने एक प्रेस रिलीज़ जारी करके कहा है कि यह एक स्पष्ट रूप से एक ग़लत प्रक्रिया थी जिसे अब बंद कर दिया गया है और यूके बॉर्डर एजेंसी आप्रवासियों के मानवाधिकारों और उनकी गरिमा का सम्मान करती है.

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