कौमार्य परीक्षण पर माफ़ी की अपील

  • 9 मई 2011

1970 के दशक में ब्रिटेन में प्रवेश करने की कोशिश कर रही कम से कम 80 एशियाई महिलाओं के कौमार्य परीक्षण के मामले में मंत्रियों से आधिकारिक माफ़ी की मांग की जा रही है.

गार्डियन अख़बार में छपी ख़बर के मुताबिक ये मांग गृह मंत्रालय के गुप्त दस्तावेज़ों के सार्वजनिक होने के बाद उठी है जिसमें भारतीय और पाकिस्तानी महिलाओं का कौमार्य परीक्षण उनकी वैवाहिक स्थिति की जांच करने के लिए किया गया. दस्तावेज़ में ऐसा लिखा गया था कि ये महिलाएं विवाह के मकसद से ब्रिटेन आती हैं और ऐसी महिलाओं की संख्या पहले के मुक़ाबले बढ़ी है.

भारतीय महिला का दर्द

महिलाओं के कौमार्य परीक्षण पर 1979 के फ़रवरी महीने में गार्डियन अख़बार में एक ख़बर छपने के बाद प्रतिबंध लगा दिया गया. अख़बार ने लिखा था कि 35 साल की एक भारतीय महिला शिक्षक जब हीथ्रो एयरपोर्ट पर पहुंचीं तो एक पुरुष डॉक्टर ने उनका कौमार्य परीक्षण ये जांचने के लिए किया कि वो शादीशुदा हैं या नहीं.

ब्रितानी गृह मंत्रालय ने शुरुआत में कौमार्य परीक्षण की बात से इनकार किया था. इस महिला ने गार्डियन के तत्कालीन सामाजिक सेवा संवाददाता मिलेनी फिलिप्स को बताया था कि उन्होंने केवल एक ऐसे फॉर्म पर दस्तख़त किए थे जिसमें स्त्रीरोग संबंधी जांच की बात कही गई थी और जिसमें ज़रूरी होने पर जननांगों की जांच भी शामिल थी.

उन्होंने बताया कि इस फॉर्म पर उन्होंने इस डर से दस्तख़त किए थे कि उन्हें वापस भारत भेजा जा सकता है.

उन्होंने बताया, ''इस घटना के बाद मैं मानसिक रूप से बहुत आहत महसूस कर रही थी. मुझे बहुद शर्मिंदगी महसूस हो रही थी. इससे पहले कभी भी मैं किसी गायनोकोलॉजिकल टेस्ट से नहीं गुज़री थी.''

हाल ही में जारी किए गए गृह मंत्रालय के दस्तावेज़ों में उस डॉक्टर का वक्तव्य भी दिया गया है जिसने महिला का कौमार्य परीक्षण किया था. डॉक्टर ने जांच के बाद आव्रजन अधिकारी को मौखिक रूप से बताया था कि उस महिला को कोई बच्चा नहीं है और इसके बाद ही उसे तीन महीने के लिए ब्रिटेन में प्रवेश की अनुमति दी गई थी.

महिला को पैसे की पेशकश

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दस्तावेजों से ये भी पता चलता है कि इस घटना के सार्वजनिक होने के बाद गृह मंत्रालय ने उस महिला को पांच सौ पाउंड की पेशकश की थी ताकि वो गृह मंत्रालय के ख़िलाफ़ कोई क़ानूनी कार्रवाई न करे.

हालांकि ये रकम मुआवज़े के रूप में नहीं थी क्योंकि अगर इस रकम को मुआवज़ा मान लिया जाता तो ये साफ हो जाता कि आव्रजन अधिकारी ने ग़लत व्यवहार किया था. तत्कालीन गृह मंत्री मर्लिन रीस ने इस घटना पर खेद व्यक्त करते हुए भी उस महिला से कोई आधिकारिक माफ़ी नहीं मांगी थी.

इस घटना के बाद भारत और अन्य सरकारों के संभावित विरोध के डर से तत्कालीन लेबर सरकार ने ये माना था कि ऐसी घटना हुई है लेकिन साथ ही ये भी कहा कि पिछले सात सालों में ऐसी केवल दो ही अन्य घटनाएं हुई हैं.

लेकिन दो ऑस्ट्रेलियाई क़ानून शोधार्थियों ने लंदन स्थित राष्ट्रीय लेखागार से गृह मंत्रालय के आंतरिक दस्तावेज़ों को खंगाल कर जो तथ्य सार्वजनिक किया उससे पता चलता है कि ऐसे परीक्षण बड़े पैमाने पर किए जा रहे थे, ख़ासतौर से भारत और पाकिस्तान के ब्रितानी उच्चायोग में.

कौमार्य परीक्षण के मामलों में आधिकारिक माफ़ी की मांग आप्रवासियों के कल्याण के लिए काम करने वाली संस्था ज्वायंट काउंसिल फॉर द वेलफ़ेयर ऑफ इमिग्रेंट्स ने भी की है जो कि 1979 की घटनाओं से भी जुड़ी हुई थी.

परिषद की क़ानूनी नीति निदेशक हिना मजीद ने कहा.''ये वाक़ई निंदनीय है कि जिन महिलाओं के साथ ऐसा भेदभावपूर्ण और शर्मनाक व्यवहार किया गया उनसे कभी कोई माफ़ी नहीं मांगी गई. हालांकि ये अतीत से जुड़ा मामला है लेकिन इससे पता चलता है कि आप्रवसन नीति बनाते समय किस तरह महिलाओं की अवहेलना की जाती है. 2011 में भले ही दक्षिण एशियाई वधुओं का कौमार्य परीक्षण नहीं किया जाता लेकिन एक कड़वी सच्चाई ये है कि आज भी कई अप्रवासी महिलाओं के साथ समान व्यवहार नहीं किया जाता.''

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