क्यों अलग हैं ममता बनर्जी

ममता बनर्जी
Image caption ममता के पीछे किसी बड़े पुरुष राजनेता का नाम नहीं लिया जा सकता जिसके बिना वो वहां पहुँच सकती थीं, जहाँ वो आज हैं.

पश्चिम बंगाल में 34 साल से सत्ता में बने हुए वामपंथियों के ख़िलाफ़ एक बड़ा राजनीतिक युद्ध लड़ने के बाद और अगली चुनौती का सामना करने से पहले, ममता बनर्जी खूब तेज़ आवाज़ में संगीत सुन रही हैं, चित्रकारी कर रही हैं और संगी-साथियों के साथ सत्ता में आने के बाद आगे की योजनाएँ बना रही हैं.

अगर ममता 34 साल बाद वामपंथियों को हटा कर सत्ता में आती हैं, तो ये कई मायनों में भारतीय राजनीति में एक नई बात होगी.

कहने को इंदिरा गांधी से लेकर सोनिया गांधी, मायावती, उमा भारती और महबूबा मुफ़्ती से जयललिता तक, भारत में महिला राजनेताओं की बड़ी फ़ेहरिस्त है. लेकिन ममता अलग हैं. इंदिरा गांधी के पीछे जवाहर लाल नेहरु थे, सोनिया के पीछे राजीव गांधी, मायावती के पीछे कांशी राम, उमा भारती के पीछे पहले विजयाराजे सिंधिया और बाद में गोविंदाचार्य, महबूबा मुफ़्ती मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी हैं तो जयललिता एमजीआर की उत्तराधिकारी हैं.

लेकिन ममता के पीछे किसी भी ऐसे बड़े पुरुष राजनेता का नाम नहीं लिया जा सकता जिसके बिना वो वहां पहुँच सकती थीं, जहाँ वो आज हैं. कोलकाता में राजनीतिक विश्लेषक रजत राय याद करते हुए कहते हैं, "जब ममता 1985 में पहली बार लोक सभा पहुँची, तो वो न तो हिंदी बोल सकती थीं न अंग्रेज़ी. मैंने ख़ुद देखा है कि लोक सभा अध्यक्ष उनको बोलने की अनुमति देने के साथ ही मुँह छिपा कर हँसते थे. लेकिन आज जब ममता बोलती है तो उनके शत्रु तक ध्यान से सुनते हैं. वो देश में वामपंथ विरोधी आंदोलन का एक मात्र चेहरा हैं." ममता और उनके खिलाफ़ राज्य की वाम मोर्चा सरकार का 10 साल से नेतृत्व कर रहे सीपीआई (एम) के मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य में कई समानताएँ हैं.

मसलन दोनों बहुत ही सादा जीवन बिताते हैं. भट्टाचार्य एक-दो कमरे के छोटे सरकरी फ़्लैट में रहते हैं और ममता एक छोटे से खांटी मध्यमवर्गीय इलाक़े में.

अपनी पहचान

जैसे मायावती की पहचान उनके महंगे आकर्षक बैग हैं जिनके बिना वो कभी नहीं चलती, ममता की पहचान उनका कपड़े का झोला है.

महज़ झोला ही नहीं उनकी साड़ी भी सस्ती कुछ सौ रुपयों वाली होती है और पैर मे उनके हमेशा नीली हवाई चप्पल होती है.

भट्टाचार्य भी सीधा सादा धोती कुर्ता ही पहनते हैं. दोनों पर निजी रूप से भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा है.

दोनों ध्यान रखते हैं कि बांग्ला साहित्य कला से उनका जुड़ाव रेखांकित होता रहे. ममता पेंटिंग करती हैं, कविता लिखती हैं और बुद्धदेब नाटक लिखते हैं और साहित्य के रसिक माने जाते हैं. रजत राय कहते हैं, "एक समानता और है. दोनों कला साहित्य में दोयम दर्जे के हैं. बुद्धदेब के नाटक ख़राब हैं और बंगाली साहित्य में उनकी कोई गिनती नहीं है. इसी तरह ममता के गाने, संगीत और उनकी पेंटिंग जो लाखों में बिक रही हैं, अव्वल दर्जे की नहीं हैं." पर ज्योति बसु की सरकार में मंत्री बने बुद्धदेब भट्टाचार्य की छवि एक पकड़ वाले सफल प्रशासक की है.

लेकिन ममता की राजनीति में खूब नाटकीयता है. वो अटल बिहारी सरकार के ज़माने में मंत्री होते हुए भी संसद में गर्भ गृह में जा कर बैठ गईं थीं.

वरिष्ठ राजनितिक विश्लेषक सौम्य बंधोपाध्याय कहते हैं कि अगर ममता जीतीं तो ये ममता का सबसे बड़ा इम्तिहान होगा और इस इम्तिहान का पर्चा भी उन्होंने खुद ही सेट किया है. अब उन्हें इसे खुद ही पास करना होगा और पर्चा जांचेगी बंगाल की जनता.

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