गिद्धों का मरना हुआ कम

गिद्ध
Image caption अभी ये नहीं कहा जा सकता कि गिद्धों की संख्या बढ़ी है

शोधकर्ताओं के मुताबिक़ दक्षिण एशिया में पशुओं में दर्द निवारक दवा के इस्तेमाल पर लगे प्रतिबंध ने गिद्धों में ज़हर फैलने को रोका है. कई गिद्ध इसलिए मारे जा रहे थे क्योंकि वे उन मवेशियों की लाश को खा रहे थे जिनका शरीर ऐसी दवाओं से दूषित हो चुका था.

ये शोध एक पीएलओएस नामक पत्रिका में छापी गई है, जिससे पहली बार ऐसे संकेत मिले हैं कि दवाओं पर लगे प्रतिबंध के कारण गिद्धों का मरना कम हुआ है.

भारत, नेपाल और पाकिस्तान की सरकार ने वर्ष 2006 में दर्द निवारक दवा डायक्लोफ़ेनैक का इस्तेमाल मवेशियों में करना बंद कर दिया था.

लेकिन ऐसा होने से पहले ही सफ़ेद रंग की पीठ वाले गिद्धों की संख्या मे 99.9 % प्रतिशत कमी आ गई थी और लंबी चोंच वाले गिद्धों की संख्या में 97 % कमी आ गई.

शोधकर्ताओं ने इस शोध के लिए सबसे पहले पांच हज़ार मरे हुए मवेशियों के कलेजे से सैम्पल लिया.

कुछ सैम्पल प्रतिबंध लगने से एक साल पहले लिए गए थे और कुछ ये पाबंदी लगने के कुछ ही समय बाद और कुछ 2006 से 2008 के बीच. इससे पता चला कि 2006 और 2008 के बीच लिए गए सैम्पल में दवा का असर कम से कम 40 प्रतिशत कम हो गया था.

लेकिन जिस संस्था ने इस शोध को आर्थिक मदद दी थी, उनका मानना है कि भारत में अब भी मनुष्यों के इस्तेमाल के लिए बनाई जा रही डायकोफ़ेनैक का इस्तेमाल मवेशियों के इलाज में किया जा रहा है.

कष्ट निवारण

इस शोध के एक लेखक, प्रोफ़ेसर रीस ग्रीन का कहना है कि मवेशियों के इस्तेमाल में आने वाली दवा के उत्पादन और ब्रिक्री पर तो रोक लग गई है और उसका कुछ असर भी दिखता है लेकिन ये काम अभी अधूरा है.

उन्होंने कहा, “अगर गिद्धों की संख्या को बचाना है तो इस दवा के इस्तेमाल को कम ही नहीं बल्कि पूरी तरह से ख़त्म कर देना होगा. इस दवा का उपयोग घायल या बीमार मवेशियों के इलाज में किया जाता रहा है.”

धार्मिक कारणों से भारत में मर रहे मवेशियों की हत्या कर उन्हें दर्द से निजात दिलाने की प्रथा नहीं है इसीलिए जब मवेशी बेहद बीमार हों, मौत के क़रीब हो, तो उसे ये दवा दे दी जाती है. तभी माल-मवेशियों में इतनी ज़्यादा डायकोफ़ेनैक की मात्रा मौजूद होती है कि उनकी लाश खाने से गिद्धों की मौत हो जाती है.

वैज्ञानिको के अनुसार एक विकल्प है कि लोग मेलोक्सीकैम नामक दवाई का इस्तेमाल करें जिससे दर्द भी कम हो जाता है और गिद्ध भी नहीं मरते हैं. उनका मानना है कि इसका इस्तेमाल बढा तो है लेकिन इसने डायक्लोफ़ेनैक की जगह नहीं ली है.

मुनीर विरानी ने दक्षिण एशिया में घटते गिद्धों पर हुए इस शोध में मदद की है और उनका मानना है कि परिणाम काफ़ी उत्साहवर्धक है.

हालांकि उनका कहना है कि इससे ये कहना बिल्कुल भी उचित नहीं होगा कि गिद्धों की संख्या में बढोत्तरी हुई है.

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