केरल में यूडीफ़ की जीत

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Image caption केरल चुनाव में एलडीएफ़ की हार

केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन यूडीएफ़ को मार्क्सवादी पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन एलडीएफ़ पर बहुत कम अंतर से जीत हासिल हुई है और अब ये तय हो गया है कि केरल में यूडीएफ़ की ही सरकार बनेगी.

हालांकि इन चुनावों में यूडीएफ़ को उम्मीद थी कि वो एलडीएफ़ पर आसान जीत हासिल कर लेगी.

आमतौर पर केरल में वामपंथी दलों के नेतृत्व वाले गठबंधन एलडीएफ़ और कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन यूडीएफ़ के बीच बारी-बारी से सत्ता बँटती रही है.

ये तय माना जा रहा था कि इस बार सत्ता यूडीएफ़ के हाथों में आ जाएगी. लेकिन सीटों का अंतर इतना कम होगा इसकी उम्मीद नहीं की जा रही थी.

वहाँ सत्तारुढ़ गठबंधन का नेतृत्व कर रही सीपीएम में अंतर्कलह और पार्टी नेतृत्व की मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन के साथ चल रही खींचतान ने इसे और आसान बना दिया था.

अभी तक चुनाव आयोग ने जो नतीजे घोषित किए हैं उसके मुताबिक यूडीएफ़ को 72 सीटों पर जीत हासिल होती नज़र आ रही है जबकि सीपीएम के नेतृत्व वाली एलडीएफ को 68 सीटों पर जीत मिलने की संभावना नज़र आ रही है.

यूडीएफ़

यूडीएफ़ की तरफ़ विपक्ष के नेता उम्मन चांडी चुनाव जीत गए हैं और उनके मुख्यमंत्री बनने की सबसे ज़्यादा संभावना जताई जा रही है.

उम्मन चांडी ने पुथुपल्ली विधानसभा सीट पर सीपीएम की सूजा सूसन जॉर्ज को 30,000 से ज़्यादा मतों से हराया. चांडी लगातार नवीं बार विधानसभा चुनाव जीत कर आए हैं.

वो 2004 से 2006 के बीच एके एंटनी के इस्तीफ़े के बाद केरल के मुख्यमंत्री भी रहे हैं.

हालांकि केरल के मज़बूत नायर नेता रमेश चेन्नीथला भी मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल हैं.

एलडीएफ़

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एलडीएफ़ के स्टार प्रचारक रहे केरल के मुख्यमंत्री 87 वर्षीय वीएस अच्युतानंदन मलपुझा सीट तो जीत गए हैं लेकिन पार्टी को हार से नहीं बचा सके.

अच्युतानंदन ने कांग्रेस की लतिका सुभाष को 23,000 मतों से पराजित किया.

हालांकि ज़्यादा उम्र होने के बावजूद अच्युतानंदन ने कड़ी मेहनत की थी और राज्य के ज़्यादातर इलाकों में चुनाव प्रचार में सक्रिय भूमिका निभाई थी.

उनकी उम्र को लेकर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने कटाक्ष भी किया था और कहा था कि अगर एलडीएफ़ सत्ता में आती है तो अगले चुनाव तक उनके मुख्यमंत्री की उम्र 92 साल हो जाएगी.

राहुल गांधी के इसी बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए अच्युतानंदन ने उन्हें 'अमूल ब्वॉय' कहा था और ये भी कि उन्होंने कई अन्य 'अमूल बेबीज़' को चुनाव मैदान में उतारा है.

एलडीएफ़ की 92 वर्षीय नेता गौरी और 78 वर्षीय एमवी राघवन भी चुनाव हार गए हैं.

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