हिमालय की गोद में भूखे गाँव

हिमालय
Image caption दूर से खूबसूरत दिखते गाँव भूख और बेकारी का शिकार हैं.

नेपाल में हिमालय की चोटियों के नज़दीक बसे गाँव दूर से तो बहुत ख़ूबसूरत लगते हैं, लेकिन पास जाने पर सच्चाई बदसूरत दिखती है.

तिब्बत की सीमा से नज़दीक ऐसे ही एक जोरापानी नाम के गाँव तक पहुँचने के बस दो ही रास्ते हैं. पहला मुख्य सड़क से हटकर दस रोज़ तक पहाड़ों की चड़ाई या फिर हैलीकॉप्टर.

इस गाँव के रहने वाले तिब्बत से सटे बर्फ से ढँकी चोटियों वाले पहाड़ों के नीचे अपने सीढ़ीदार खेतों में गेहूं और ज्वार उगाते हैं. पर आदिम युग की खेती की तकनीकों और अपर्याप्त वर्षा के चलते उपज कम ही होती है.

गाँव में एक नौ वर्षीय बेटे के पिता प्रकाश शाही ने बताया, "हमारे बच्चे कुपोषित हैं और कई तो अपंग भी हैं क्योंकि उन्हें पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं मिलता."

बंजर भूमि

स्थानीय किसान प्रेम बहादुर मल्ला का कहना है कि उनके गाँव के लोग बिना खाद्य सहायता के जीवित नहीं रह सकते हैं.

वो कहते हैं, "अगर पानी ना गिरा तो ज़मीन पर कुछ नहीं होगा. अगर पानी गिरा भी तो सारे साल काम करने बाद हम केवल तीन महीने लायक़ अनाज उगा पाते हैं."

दूर से देखने पर ये गाँव किसी तस्वीर से उतरे हुए लगते हैं, लेकिन वहां पहुँचने पर ये गंदगी के नीचे दबा हुआ मिलता है. चारों तरफ भिनभिनाती मक्खियाँ, कुपोषण के शिकार बच्चे और ग़रीबी साफ़ दिखती है. इन इलाक़ों में औसत आयु महज़ 47 साल है.

पिछले एक दशक से अंतराराष्ट्रीय सहायता एजेंसियां जैसे संयुक्त राष्ट्र खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफ़पी) इन गाँवों में हवाई मार्ग से खाना पहुंचा रहा है. इन गाँववालों के लिए दुखद बात ये है कि संस्था आने वाले दो महीनों में अपने प्रयासों में कटौती करने जा रही है.

दानदाताओं की कमी के कारण डब्ल्यूएफ़पी जिन लोगों तक भोजन पहुंचाता था, उनकी संख्या 10 लाख से घट कर एक लाख रह जाने की आशंका है.

'सरकारी अनदेखी'

Image caption हैलीकॉप्टर या कई दिनों की पहाड़ों की चढ़ाई इन गाँव तक पहुँचने का अकेला रास्ता हैं

कभी इन पहाड़ों से माओवादियों का आंदोलन शुरू हुआ था. एक दलित महिला केला नेपाली को लगता है कि देश की सरकार उन्हें भूल गई है.

वो कहती है, "अगर सरकार हमारी तरफ़ ध्यान दे, तो शायद कुछ विकास हो. मैंने ख़ुद भारत जा कर छह-सात साल काम किया है, ताकि मैं अपने बच्चों को पाल सकूं."

डब्ल्यूएफ़पी की क्रिस्टीना हॉब्स का कहना है कि आने वाले दिनों में देश की सरकार को ज़्यादा से ज़्यादा ज़िम्मेदारी संभालनी होगी.

जोरापानी में लोगों का कहना है कि दशकों से कोई सरकारी अधिकारी उनकी सुध लेने नहीं आया और गाँव की एकमात्र सरकारी इमारत पर गधों के एक झुंड का कब्ज़ा है.

नेपाल की सरकार का कहना है कि वो इस इलाके के विकास की योजनाएँ बना रहे हैं. लेकिन नेपाल की राजनीतिक हालत को देख कर किसी नीति-निर्माता का ध्यान इस ओर जाए, ऐसा मुश्किल लगता है.

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