आंदोलन की तैयारी में किसान

  • 20 मई 2011
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ग्रेटर नोएडा के भट्टा पारसौल गाँव में सात मई को हुए गोलीकांड के बाद इलाक़े के किसानों ने एकजुट होकर आंदोलन के लिए कमर कस ली है.

आज दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में 25 गाँवों से आए किसानों और कार्यकर्ताओं ने कहा कि अब उनकी माँग अँग्रेज़ों के ज़माने के भूमि अधिग्रहण क़ानून को ख़ारिज करवाना है.

उन्होंने कहा कि इस क़ानून की आड़ में किसानों से चार-चार फ़सल देने वाली उपजाऊ ज़मीन औने-पौने दामों में छीन ली जाती है.

किसानों की माँग है कि एक क़ानून बनाकर ये तय किया जाए कि सार्वजनिक कार्यों के लिए किसानों की ज़मीन लेने से पहले ग्रामसभा की राय ली जाए.

किसान संघर्ष समिति के प्रवक्ता डॉक्टर रूपेश कुमार ने कहा कि ग्राम पंचायत नहीं बल्कि ग्रामसभा, यानी सभी किसानों की भागीदारी से ज़मीन अधिग्रहण का फ़ैसला किया जाना चाहिए.

असहमति

किसान नेताओं ने केंद्र सरकार की ओर से प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण क़ानून के मसविदे पर अपनी असहमति ज़ाहिर की.

डॉक्टर रूपेश कुमार ने कहा कि इस मसविदे में सरकार ने कॉरपोरेट कंपनियों को अधिग्रहीत ज़मीन का 30 प्रतिशत देने का एक उपनियम डाल दिया है.

उनका कहना है कि इसके कारण ज़मीन अधिग्रहण आम जनता के हित में नहीं बल्कि अमीर कॉरपोरेट कंपनियों के पक्ष में किया जाएगा.

उन्होंने बताया कि किसानों से साढ़े आठ लाख रुपए प्रति एक हज़ार वर्ग मीटर की दर से उत्तर प्रदेश सरकार ने ज़मीन हासिल की है और इसे निजी बिल्डरों को एक करोड़ सत्तर लाख रुपए की दर से बेचा जा रहा है.

उन्होंने कहा, “हम सब पीड़ित हैं परेशान हैं अपनी ज़मीनों और जीविका से मुहाल हैं. हम सिर्फ़ एक ही माँग कर रहे हैं कि अगर 1894 का क़ानून बदल जाए तो हमारी जान छूट सकती है.”

सार्वजनिक हित?

रूपेश ने कहा कि मायावती सरकार ने ग्रेटर नोएडा से आगरा तक यमुना एक्सप्रेस के साथ साथ पाँच शहर बसाने के लिए जेपी को लाइसेंस दिए गए हैं. इन रिहाइशी बस्तियों में स्वीमिंग पूल होंगे, पाँच सितारा होटल बनेंगे और इनका हमारी खेती किसानी से कोई लेना देना नहीं होगा.

विकास संघर्ष समिति, ग़ाज़ियाबाद के बी सी कंसल ने विस्तार से बताया कि किस किस तरह से खेती की ज़मीन पर क़ब्ज़ा किया जा रहा है.

उन्होंने कहा पेट्रोलियम मंत्रालय की ओर से पाइपलाइन बिछाई जा रही हैं. ईस्टर्न पैरिफ़ैरल वे के लिए तीन सौ फ़ुट चौड़ाई की रोड बन रही है. हाईटैक और इन्टीग्रेटेड सिटी बन रही है. प्राइवेट बिल्डर मनमानी दर पर ज़मीनें छीन रहे हैं.

उन्होंने खेती की ज़मीन को जेपी बिल्डर को देने की तुलना ईस्ट इंडिया कंपनी से की.

मौन जुलूस

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Image caption भट्टा पारसौल में किसानों ने चार महीने तक शांतिपूर्ण आंदोलन चलाया.

बंसल ने कहा, “जिस तरह ईस्ट इंडिया कंपनी को अलग-अलग इलाक़े एलॉट कर दिए गए थे उसी तरह आज भी सरकार ने आगरा तक की ज़मीन जेपी कंपनी को दे दी है.”

उन्होंने सवाल किया, “सरकार कहती है कि ज़मीनें सार्वजनिक हित के लिए ली जा रही है. सार्वजनिक हित आदमी का पेट भरने में है या उसे उजाड़ कर उसके खेतों में बहुमंज़िला इमारत बनाने में?”

जनांदोलन के राष्ट्रीय समन्वय की ओर से मधुरेश कुमार ने कहा कि 21 मई को प्रभावित किसान सूरजपुर से भट्टा पारसौल तक मौन जुलूस निकालेंगे.

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