बर्मी बंदियों ने सुनाया जेल का हाल

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Image caption बर्मा में सरकार ने इस सप्ताह 15 हज़ार बंदियों को रिहा करने का आदेश जारी किया था

बर्मा में इस सप्ताह रिहा किए गए राजनीतिक बंदियों ने बताया है कि जेल में उनके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया गया.

इन बंदियों में शामिल एक बौद्ध भिक्षु ने बीबीसी की बर्मी सेवा को कारावास में बंदियों के साथ हुए व्यवहार के बारे में जानकारी दी.

संदाडिका नामक इस भिक्षु ने बीबीसी को बताया कि उसका अपराध केवल ये था कि वो इनसेन जेल में बंद लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू ची के प्रति समर्थन जताने के लिए उस जेल तक गए थे.

भिक्षु सांदाडिका ने बीबीसी को बताया,"हिरासत में पुलिसकर्मी मुझे बूट से मारते थे और कहते थे कि मैं असली भिक्षु नहीं हूँ.

"पूछताछ के दौरान मुझे उल्टा लटकाकर बाँस से पीटा गया. इस यातना के कारण मुझे हार्निया की बीमारी हो गई.जेल में दूसरे क़ैदियों की चिकित्सा की जाती थी मगर राजनीतिक बंदी भिक्षुओं पर ध्यान नहीं दिया जाता था."

एक और राजनीतिक बंदी, सू ची की पार्टी नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी की युवा शाखा के आंग गी ने भी बीबीसी को जेल के हालात की जानकारी दी.

आंग गी ने बताया,"राजनीतिक बंदियों को आठ फ़ीट की एक कोठरी में बंद रखा जाता था और केवल दो घंटे बाहर जाने दिया जाता था. कोठरी में टॉयलेट नहीं था और हमें खाना भी उसी के भीतर खाना पड़ता था."

क्षमादान

बर्मा की सरकारी मीडिया ने इस सप्ताह ख़बर दी थी कि राष्ट्रपति थेइन सेइन ने मानवीय आधार पर एक आम क्षमादान पर हस्ताक्षर किए हैं.

इसके तहत मौत की सज़ा को उम्रक़ैद में परिवर्तित करने और कारावास की अवधि में एक साल की कटौती करने का एलान किया गया.

इसके बाद देश भर से लगभग 15 हज़ार बंदियों को रिहा किया गया.

मगर इन हज़ारों बंदियों में केवल 47 लोग राजनीतिक बंदी थे.

कुछ मानवाधिकार संगठनों ने इस क्षमादान की आलोचना करते हुए कहा है कि बर्मा की जेलों में लगभग 2200 राजनीतिक बंदी क़ैद हैं.

मानवाधिकार संगठनों ने बर्मा सरकार के इस क़दम को विदेशों में अपनी छवि सुधारने के एक हथकंडा क़रार दिया है.

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