कश्मीर की गुम होती बेटियां

  • 23 मई 2011
कश्मीर रैली
Image caption श्रीनगर में कम से कम 200 स्कूली लड़कियों ने सुरक्षाबलों की निगरानी में जुलूस निकाला.

दस साल पहले, भारत प्रशासित कश्मीर को लड़कियों के पैदा होने के लिए सबसे बेहतर जगह माना जाता था. लेकिन अब ऐसा नहीं है. कश्मीर घाटी पिछले दो दशकों से भारत विरोधी सशस्त्र पृथकतावादी आंदोलन से जूझ रही है. अब ये जगह केवल इन आंदोलनों के लिए ही सुर्खियों में नहीं है बल्कि अब यहां लड़कियों को मारा जा रहा है, बेरहमी से और कई मामलों में उनके पैदा होने से पहले ही.

चार साल पहले जब कश्मीर विश्वविद्यालय में क़ानून की प्रोफ़ेसर गुल अफ़रोज़ ने घाटी में कन्या भ्रूण हत्या के बढ़ते मामलों को लेकर आवाज़ उठाई तो उनका मज़ाक उड़ाया गया.

गुल अफ़रोज़ जान ने एक शोध किया जिसमें उन्होंने 100 गर्भवती महिलाओं से बात की और उनमें से दस औरतों ने स्वीकार किया कि उन्होंने लिंग परीक्षण के बाद गर्भपात करवाया है.

उनका कहना था, "हमारे जैसे पुरूष प्रधान समाज में, लड़के के लिए प्राथमिकता हमारी मानसिकता का हिस्सा है. बेटा हमारे कुल को बढ़ाता है जबकि बेटियां एक भार है जिन्हें मोटे दहेज के साथ ब्याहना पड़ता है".

दो बच्चों की नीति

गुल अफ़रोज़ जान ने आगे बताया कि मध्यम वर्गीय परिवारों में दो बच्चों की नीति अपनाई जा रही है, परिवार इसीलिए अब कन्या भ्रूण हत्या का सहारा ज़्यादा लेते हैं.

वो बताती हैं, ''इस तकनीक ने हज़ारों लड़कियों के जन्म लेने के अधिकार को भी कम कर दिया है. मैंने प्रशासकों को कहा कि निकट भविष्य में आपको चरमपंथ के अलावा एक और चुनौती से जूझना पड़ेगा. सब सकते में आ गए. सबका एक ही कहना था. हम मुसलमान हैं. हमारे समाज में ये सबकुछ नहीं होता है.''

गुल अफ़रोज़ का कहना है कि अधिकारी इस बात पर यक़ीन करने को तैयार नहीं थे और इस बात पर ज़ोर देते रहे कि शोध का सैम्पल साइज़ छोटा है इसीलिए इसके परिणाम पर भरोसा नहीं किया जा सकता है और कश्मीर में लिंग अनुपात एकदम ठीक है.

लेकिन जब 2011 के जनगणना के शुरूआती आंकड़े आए तो इससे बात सामने आई कि जम्मू कश्मीर में सबसे तेज़ी से लिंग अनुपात घटा है. गुल अफ़रोज़ का डर, सच में तब्दील हो गया.

2001 में सात साल के कम उम्र के हर एक हज़ार लड़कों के अनुपात में 941 लड़कियां थीं, अब ये संख्या 859 हो गई है.

Image caption गुल अफ़रोज़ जान ने इस बारे में एक शोध किया

दूसरे नम्बर पर महाराष्ट्र है जहां लड़कियों की अनुपात संख्या पहले से अब तीस कम है.

जम्मू क्षेत्र में 2001 में भी लिंग अनुपात कम था. लेकिन घाटी की बात अलग थी और इसके कई इलाकों मे लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक थी.

ताज़ा जनगणना के परिणामों के बाद प्रशासन जवाब की तलाश में है.

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का कहना है कि इन परिणामों को समझना मुश्किल है.

उमर कहते हैं, ''कश्मीर घाटी में जम्मू के मुकाबले ये गिरावट ज़्यादा है. ये समझना ज़रा मुश्किल है. हमें अब इसके दूरगामी परिणामों के लिए जम्मू कश्मीर के लोगों को जगाना पड़ेगा.''

उन्होंने इस स्थिति को चिंताजनक बताया है.

मेडिकल टेस्ट केवल एक वजह

कश्मीर घाटी के स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशक डाक्टर सलीम उर रहमान का कहना है कि 2001 की जनगणना में परिणाम अच्छे थे तो हमें लगा हम इस मामले में ठीक काम कर रहे हैं और हम सब थोड़ा आत्मसंतुष्टि का शिकार हो गए.

डाक्टर रहमान के आदेश पर 100 अल्ट्रासाउंड क्लीनिकों को सील कर दिया गया है. कई इलाकों में ऐसे केन्द्रों के ख़िलाफ़ कार्रवाईयां की गई हैं. कई और केन्द्रों को नोटिस भेजा गया है.

वो बताते हैं, "कुछ केन्द्र तो बेहद बड़ा नाम हैं. लेकिन वो बहुत बुरा काम कर रहे हैं. हम जानते हैं कि वो लिंग परीक्षण कर रहे हैं. मैं मेडिकल तकनीक को इस घृणित कार्य में हिस्सा नहीं लेने दूंगा".

लेकिन तकनीक इस पूरी समस्या का एक पहलू है. सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब तक बेटे की चाहत कम नहीं होगी, समस्या को ख़त्म नहीं किया जा सकता है.

अब प्रशासन ने इससे निपटने के लिए धार्मिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद की गुहार की है.

स्कूली बच्चों की रैलियां आयोजित की जा रही हैं ताकि लोगों में इस बारे में जानकारी पंहुचाई जा सके.

श्रीनगर में एक सुबह, कम से कम 200 स्कूली लड़कियों ने सुरक्षाबलों की निगरानी में जुलूस निकाला.

वे नारे लगा रहे थे कि ‘जनसंहार बंद हो’ और ‘कन्याओं को बचाया जाए’

इस्लाम के ख़िलाफ़

बारिश से छात्राओं के उत्साह में कोई कमी नहीं आई. जल्द ही वे सब बारिश में गीली हो गईं लेकिन अभियान ने उन्हें सोचने पर मजबूर किया है.

इस विषय पर काम कर रहे साबू जार्ज ने हाल ही में श्रीनगर में एक बैठक में हिस्सा लिया.

वो कहते हैं, ''कश्मीर में कम से कम अधिकारियों ने ये माना है कि समस्या है. ये इस बेहद मुश्किल लड़ाई से मुक़ाबला करने के लिए पहला ज़रूरी क़दम है. मैं जब पहले आया करता था तो औरतें कहा करती थी कि ये बेहद सामान्य बात थी, केवल श्रीनगर में 100 से ज़्यादा क्लीनिक मौजूद थे और उन्हें अल्ट्रासाउंड के स्लाइड चाहिए होते थे.''

शौक़त हुसैन केंग जो कि श्रीनगर के ओरियंटल कॉलेज में इस्लाम धर्म को पढ़ाते हैं, उनका कहना है कि लड़कियों को मार कर हम मानवता से दूर हो रहे हैं.

शौकत कहते हैं, ''अरब देशों में, पहले लोग अपनी बेटियों को ज़िदा दफ़ना देते थे लेकिन जब पैगम्बर मोहम्द आए तो उन्होंने इस घृणित रिवाज को ख़त्म करवा दिया. उन्होंने मुसलमानों से अपनी बेटियों की क़ीमत पहचानने को कहा. अब हम फिर से आदम ज़माने में चले गए हैं.''

हाल ही में, राज्य के पूर्व मुख्य मंत्री फ़ारूख़ अब्दुल्ला ने कहा कि अगर कन्या भ्रूण हत्या पर तुरंत रोक नहीं लगी तो भारत में पुरूष समलैंगिक हो जाएंगे.

उन्होंने शायद ये बात हल्के में कही थी लेकिन राज्य में लड़कियों को बचाना मज़ाक की बात नहीं होगी.

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