अफ़्रीका में भारत की रुचि के कारण

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Image caption भारत अफ़्रीकी महाद्वीप में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की ओर अग्रसर है.

भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इथियोपिया की राजधानी अदिस अबाबा में 23 मई को दूसरे अफ़्रीका-भारत शिखर सम्मेलन के उदघाटन के साथ अपने छह दिनों के अफ़्रीका दौरे की शुरूआत की.

अपने प्रधानमंत्री काल के पिछले आठ बर्षों में मनमोहन सिंह की ये तीसरी अफ़्रीका यात्रा है. उनके साथ मंत्रियों और उद्योगपतियों का एक प्रतिनिधिमंडल भी अफ़्रीका की यात्रा पर है.

हालांकि अफ़्रीका में भारत की मौजूदगी कोई नई नहीं है लेकिन उनकी ये यात्रा भारत-अफ़्रीका संबंधों में एक नया अध्याय शुरू कर रही है.

भारत-अफ़्रीका शिखर सम्मेलन पर नज़र

अफ़्रीका और भारत दुनिया के दो सबसे तेज़ी से विकास की ओर अग्रसर क्षेत्र हैं.

अफ़्रीका में पिछले एक दशक में पांच प्रतिशत की दर से विकास हुआ है. वहां घरेलू बाज़ार के अलावा उभरती ताक़तें भी अपना प्रभाव बढ़ाने की होड़ में लगी हैं.

1990 की शुरूआत से ही भारतीय अर्थव्यवस्था की वार्षिक विकास दर नौ प्रतिशत के आस-पास रही है. इस दौरान भारत ने अफ़्रीका समेत दुनिया के कई हिस्सों में अपना प्रभाव बढ़ाया है.

चीन से होड़?

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Image caption भारत चीन के बाद अफ़्रीका का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक पार्टनर है.

हाल में भारत और अफ़्रीका के बीच द्विपक्षीय व्यापार में बहुत अधिक इजाफ़ा हुआ है. भारत और अफ़्रीका के बीच पिछले साल 46 अरब अमरीकी डॉलर का व्यापार हुआ. ये वर्ष 2001 की तुलना में 15 गुना अधिक है. वर्ष 2015 तक कुल व्यापार 70 अरब तक पहुंचने की अपेक्षा है.

तेल के अलावा अफ़्रीका और भारत के बीच दवाईयां,सोने,हीरे और सूचना प्रोद्यौगिकी के क्षेत्र में व्यापार हो रहा है.

अब भारत चीन के बाद अफ़्रीका का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक पार्टनर है.

भारत देगा अफ़्रीका को अरबों डॉलर की मदद

इसके अलावा जानकार मानते हैं कि भारत की अफ़्रीका में दिलचस्पी की वजह अपने प्रतिद्वंद्वी चीन से मुक़ाबला करना भी है.

लेकिन भारत मज़बूती से कहता है कि उनकी योजना अफ़्रीकी महाद्वीप पर चीन के प्रभाव से प्रतिस्पर्धा करने की नहीं है. वास्तव में भारत के पास चीन जैसी वित्तीय और राजनीतिक ताक़त नहीं है.

व्यापार की दृष्टि से भी भारत का अफ़्रीका में निवेश चीन से आधा भी नहीं है. इस वर्ष चीन का लक्ष्य अफ़्रीका के साथ अपने व्यापार को 110 अरब डॉलर से अधिक करना है.

बराबर के रिश्ते?

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Image caption चीन अफ़्रीका का एक बड़ा व्यापार सहयोगी है.

अफ़्रीकी महाद्वीप में भारत की अप्रत्याशित दिलचस्पी को और अधिक संसाधनों और भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नए बाज़ार ढ़ूंढने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.ये उद्देश्य चीनी मक़सदों से अधिक अलग नहीं हैं.

साथ ही अफ़्रीकी राष्ट्रीय संपभुता पर भारत और चीन के विचार एक-से हैं, हालांकि ये पश्चिम से बिल्कुल भिन्न हैं.

अगर भारत को सुडान के मुद्दे पर पश्चिम की ओर वैसे अनादर का सामना नहीं करना पड़ रहा है जैसा चीन को करना पड़ा है तो इसकी वजह ये है कि भारत अफ़्रीका में चीन के मुक़ाबले अब भी छोटा निवेशक है.

साथ ही भारत एक लोकतंत्र है जिसकी विदेश नीति अधिक बहुमुखी है.

एक दिन भारत को भी उन्हीं दुविधाओं का सामना करना पड़ेगा जिनका आज चीन कर रहा है.

बहरहाल,जहां चीन का ज़ोर संसाधनों के दोहन और बड़े बुनियादी ढांचों की परियोजनाओं पर होता है वहीं भारत-अफ़्रीका संबंध बराबरी, आपसी हित और पारदर्शिता पर आधारित हैं. ऐसा दावा किया जाता है कि भारत के सम्मिलित विकास का मॉडल अफ़्रीका में स्थानातंरित किया जा सकता है. भारत की निजी कंपनियां अफ़्रीका में अपनी कुशलता पहुंचा रही हैं और साथ ही ये कंपनियां वहां वहन करने योग्य,अनुकूलनशील और उपलब्ध तकनीक भी ले जा रही हैं.

भारत ने हाल ही में अफ़्रीका में 19 शैक्षिक संस्थान स्थापित करने के लिए एक समझौता किया है. साथ ही भारत बोतस्वाना में हीरा प्रसंस्करण के लिए एक फ़ैक्टरी स्थापित कर रहा है.

वैश्विक राजनीति

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Image caption भारतीय टेलीकॉम कंपनी एयरटेल ने अफ़्रीका में बड़ा निवेश किया है.

भारत-अफ़्रीका संबंधों के लिए भारत की वैश्विक महत्वकांक्षाएं भी अति महत्वपूर्ण हैं.

दुनिया की विभिन्न संस्थाओं और बैठकों में विकसित देशों की आवाज़ बनने के अलावा भारत संयुक्त राष्ट्र संघ के पुनर्गठन और विस्तार के लिए काम करता रहा है. और लगभग सभी अफ़्रीकी देश संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता पाने के प्रयास का समर्थन करते हैं.

भारत की ताज़ा कोशिश उसके इन प्रयासों को और प्रगाढ़ और गहरा करने की कोशिश है.

भारत-अफ़्रीका के बीच व्यापार और निवेश के संबंधों को मज़बूत करने के लिए मुक्त-व्यापार समझौता करना, ऋण की नई व्यवस्था स्थापित करना और संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में अफ़्रीका के लिए दो सीटों का समर्थन करना शामिल है.

ये सभी कदम भारत-अफ़्रीका मैत्री को बढ़ावा देने वाले हैं.

अगर भारत अपना वादा निभाता है तो ये देखना होगा कि अफ़्रीकी देश भारत की पहल पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं और वे उनके महाद्वीप पर बहुमुखी अंतरराष्ट्रीय दिलचस्पी का कैसे सामना करते हैं.

डॉक्टर सिमोना विटोरिनी और डॉक्टर डेविड हैरिस यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंडन के स्कूल ऑफ़ ओरिएंटल ऐंड अफ़्रीकन स्टडीज़ में पढ़ाते हैं.

यहां प्रस्तुत विचार इन्हीं लेखकों के हैं नाकि बीबीसी के. ये सामग्री सिर्फ़ आम जानकारी के लिए है और इसे निवेश, कर, क़ानूनी और किसी अन्य किस्म की सलाह ना माना जाए. आप इस जानकारी के आधार पर कोई निवेश ना करें और ना ही किसी निवेश के फ़ैसले को स्थगित करें. अपनी स्थिति के हिसाब से हमेशा स्वतंत्र और पेशेवर सलाह लें.

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