नेपाल में फिर राजनीतिक उहापोह

  • 27 मई 2011
माओवादी समारोह

नेपाल में संविधान सभा का कार्यकाल पूरा होने से एक दिन पहले राजधानी काठमांडू में कई जातीय संगठनों ने हिंसक प्रदर्शन किए.

प्रदर्शनकारियों ने सुबह से ही सड़कों पर उतर कर नारे लगाने शुरू कर दिए और कम से कम चार गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया.

चूरे-भाबर राष्ट्रीय एकता समाज, ब्राह्मण समाज और खस-छेत्री आदिवासी समुदायों की ओर से आयोजित विरोध प्रदर्शनों के बाद शहर में यातायात लगभग ठप हो गया. लोग पैदल ही अपने दफ़्तरों की ओर जाते हुए नज़र आए.

उनकी माँग है कि नए संविधान में दूसरे जातीय समूहों की तरह उन्हें भी आरक्षण और दूसरी सुविधाएँ दी जाएँ.

हालाँकि नया संविधान लिखा जाना असंभव है क्योंकि संविधान सभा की मियाद 28 मई को समाप्त हो रही है.

विचार विमर्श

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Image caption लंबी खींचतान के बाद माओवादियों और एकीकृत माले पार्टी के बीच समझौता हुआ.

संविधान सभा के कार्यकाल को बढ़ाए जाने के लिए राजनीतिक पार्टियों के बीच आज विचार विमर्श का दौर चल रहा है.

काठमांडू से बीबीसी नेपाली के संवाददाता सुरेंद्र फुयाल का कहना है कि अगर संविधान सभा का कार्यकाल बढ़ाए जाने पर राजनीतिक दलों में सहमति न हो पाई तो 2006 के बाद से जारी शांति प्रक्रिया ख़त्म हो जाएगी और नेपाल अस्थिरता और अराजकता की स्थिति में चला जाएगा.

इस समय नेपाल में एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी पार्टी के नेतृत्व की सरकार है जिसमें एकीकृत माओवादी पार्टी भी शामिल है.

प्रमुख विपक्षी पार्टी नेपाली कांग्रेस का कहना है कि जब तक माओवादी पार्टी अपने हथियार सरकार को सौपने को राज़ी नहीं होती तब तक वो राष्ट्रीय सहमति की सरकार में शामिल नहीं होगी.

लेकिन पार्टी का ये भी कहना है कि अगर माओवादी अपने हथियारों की चाबी सरकार को सौंपने को तैयार हो जाते हैं तो फिर नेपाली काँग्रेस माओवादी चेयरमैन पुष्पकमल दहाल ‘प्रचण्ड’ के प्रधानमंत्री बनाए जाने का समर्थन करेगी. साथ ही राष्ट्रीय सहमति की सरकार में भी शामिल होगी.

राजनीतिक दाँवपेंच

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Image caption नेपाली काँग्रेस ने माओवादियों के सामने कई शर्तें रखी हैं.

दस साल तक नेपाल में हथियारबंद आंदोलन चलाने के बाद माओवादियों ने संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में लड़ाई बंद करने पर सहमति जताई थी.

लेकिन उनकी शर्त थी कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के योद्धाओं को नेपाली सेना में समायोजित किया जाए.

इसके साथ ही माओवादी पार्टी अपने छापामारों को छावनियों में रखने और अपने हथियारों को ताले में बंद करने को राज़ी हो गई.

लेकिन तब से अब तक माओवादी छापामारों को नेपाली सेना में समायोजित नहीं किया जा सका है. नेपाली कांग्रेस और ग़ैर माओवादी पार्टियाँ इसके पक्ष में नहीं हैं.

माओवादी पार्टी के भीतर भी पार्टी की राजनीतिक लाइन को लेकर ज़बरदस्त संघर्ष छिड़ा हुआ है.

मोहन वैद्य ‘किरन’ जैसे नेताओं का आरोप है कि दस साल में हासिल की गई उपलब्धियाँ पार्टी चेयरमैन प्रचण्ड की नीतियों के कारण बरबाद होने जा रही हैं. वो माओवादियों के हथियारों की चाबी सरकार को सौंपने के सख़्त ख़िलाफ़ हैं.

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