'बिजली कहाँ से आएगी?'

एंगेला मर्केल
Image caption एंगेला मर्केल को उम्मीद है कि पवन ऊर्जा से बिजली की ज़रूरत पूरी होगी

जर्मनी की सरकार के सभी परमाणु ऊर्जा केंद्रों को वर्ष 2022 तक बंद करने के फ़ैसले ने जर्मनी के उद्योग जगत की चिंताएं दोगुनी कर दी हैं.

बीबीसी के बर्लिन संवाददाता स्टीफन इवांस के मुताबिक ऊर्जा कंपनियों ने परमाणु संयंत्रों के बंद होने की स्थिति में कीमतें बढ़ने की चेतावनी पहले ही दे रखी है.

जर्मनी देश की बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बिजली को आयात करता है.

विश्लेशकों का मानना है कि परमाणु संयंत्रों के बंद होने की स्थिति में कोयला आधारित स्टेशनों के साथ साथ पड़ोसी चेक गणराज्य व फ्रांस पर भार काफ़ी बढ़ जाएगा.

कठिन विकल्प

सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि जर्मनी के दक्षिणी हिस्से में परमाणु ऊर्जा संयत्रों से ही म्यूनिख़ और स्टुटगार्ट जैसे शहरों में बिजली की आपूर्ति होती है यहाँ भारी उधोग और फोक्सवैगन जैसी बड़ी कंपनियां है जंहाँ बिजली की ख़पत काफ़ी ज़्यादा है.

अगर ये संयत्र बंद हो जाते हैं तो कोशिश होगी कि उत्तरी क्षेत्र से पवन ऊर्जा के ज़रिए इस कमी को पूरा जाए. लेकिन इसके लिए नए उच्च वोल्टेज वाले केबल की ज़रूरत होगी.

एक प्रमुख ऊर्जा कंपनी ई.ऑन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जोहनस तैय्सीन का कहना है कि उत्तर से पवन बिजली को दक्षिण तक पहुंचाने के लिए उनके पास केबल नही हैं. और ये सबसे बड़ी दिक्कत है.

हांलाकि इस समस्या से बचने के लिए नए उच्च वोल्टेज वाले केबल प्रस्तावित हैं.

ये केबल मार्ग एक सौ साठ किलोमीटर से भी ज़्यादा लंबा होगा और ये जंगल और सुंदर हरे भरे क्षेत्रों से गुज़रेगा.

पर्यावरण संरक्षणवादियों का विरोध

Image caption प्रकृति और वन्य जीवन को होने वाले नुकसान के विरोध में प्रदर्शन शुरू हो गए हैं

प्रकृति संरक्षणवादी इसलिए इस योजना का विरोध कर रहे है क्योंकि इससे प्रकृति और वन्य जीवन का भारी नुकसान होगा.

इसके विरोध में प्रदर्शन शुरू हो भी गए हैं

इन सारी बातों को ध्यान में रखते हुए जर्मनी की सरकार के पास कठिन विकल्प है .

एक पवन ऊर्जा जिसे ले जाना न आसान है और न ही सस्ता. दूसरा थोड़ा आसान विकल्प है कोयला आधारित ऊर्जा जिसका पर्यावरण संरक्षणवादी हमेशा से विरोध करते आए हैं.

बर्लिन के इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च में प्रोफेसर क्लाउडिया केमफर्ट का कहना है कि अगले दशकों में कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन काफ़ी मात्रा में बढ़ जाएगा क्योंकि जर्मनी की तरह ही तमाम देश बिजली के लिए कोयले का इस्तेमाल करने लगेगें और ये जलवायु परिवर्तन के लिए बुरा है.

महत्वपूर्ण है कि फ़ुकुशिमा हादसे के बाद जर्मनी में परमाणु संयंत्र बंद करने के पक्ष में बड़े-बड़े प्रदर्शन हुए थे.

जापान में आये भूकंप और सुनामी के बाद फ़ुकुशिमा परमाणु संयंत्र से रोडियोधर्मी पदार्थों के रिसने के बाद से ही जर्मनी में मार्च में ही सात पुराने परमाणु संयंत्रों को स्थायी तौर पर बंद कर दिया गया था.

जर्मनी में पर्यावरण को बचाने के पक्ष में बहुत बड़ा अभियान दशकों तक चला है. जर्मनी की कुल ज़रूरत में से 25 फ़ीसदी ऊर्जा परमाणु संयंत्रों से आती है और अब जर्मनी की सरकार के फ़ैसले के बाद सवाल है कि बिजली कहाँ से आएगी ?

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