'परमाणु मामले में पारदर्शिता लानी होगी'

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Image caption फूकूशिमा संकट के बाद जर्मनी में परमाणु ऊर्जा का विरोध बढ़ा

जापान में आए भूकंप और सुनामी के बाद फुकुशिमा में जो परमाणु रिसाव का संकट पैदा हुआ था उसके देशव्यापी विरोध के बाद जर्मनी की सरकार ने 2022 तक अपने सभी 17 परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को बंद करने का फ़ैसला लिया है. जर्मनी की ऊर्जा ज़रूरतों का क़रीब 25 फ़ीसदी परमाणु ऊर्जा से पूरा होता है. जर्मनी की सरकार इन 10-11 सालों में पवन और सौर ऊर्जा जैसे अक्षय ऊर्जा स्रोतों से अपनी 25 फ़ीसदी ऊर्जा ज़रूरत को पूरा करने की कोशिश करेगी.

जर्मनी की सरकार के इस फ़ैसले के क्या मायने हैं, क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक मजबूरी जैसी बात भी छिपी है - यही समझने के लिए बीबीसी हिंदी ने बात की आर्थिक मामलों के जानकार नरेंद्र तनेजा से.

जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल पिछले साल तक परमाणु ऊर्जा नेटवर्क की अवधि बढ़ाने की बात कर रही थीं, लेकिन अब अचानक वहां की सरकार ने देश के सभी परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को 2022 तक बंद करने का फ़ैसला किया है, नीति में अचानक आए परिवर्तन की क्या वजह रही होगी?

फुकुशिमा में जो हादसा हुआ, जो दुर्घटना हुई उसके बाद से जर्मनी में ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले विपक्षी दल और वहां की जनता ने सड़कों पर उतर कर परमाणु संयंत्रों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन शुरू कर दिया.

लोग सरकार से ये कहने लगे कि परमाणु बिजली संयंत्र ख़तरनाक होते हैं, इन्हें बंद कर दिया जाना चाहिए, इनका विस्तार नहीं किया जाना चाहिए.

जर्मनी में परमाणु ऊर्जा के ख़िलाफ़ जिस तरह का विरोध देखने को मिला वैसा बहुत कम देशों में देखने को मिलता है.

ये सही है कि जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल ने कुछ दिन पहले कहा था कि देश की ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए परमाणु ऊर्जा का विस्तार किया जाना चाहिए.

लेकिन जापान के हादसे के बाद जिस तरह वहाँ और पूरी दुनिया में परमाणु ऊर्जा को लेकर विरोध के स्वर उठे हैं, उसे देखते हुए एक राजनेता होने के नाते एंगेला मर्केल ने भी सोचा होगा कि जनभावना को ज़्यादा समय तक नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है.

एक और बात ये है कि परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को बंद करने की जो बात की जा रही है वो 2022 के बारे में की जा रही है जो अभी काफ़ी दूर है. किसी भी देश के राजनेता इतना लंबा नहीं सोचते.

उदाहरण के तौर पर स्वीडन का उदाहरण हमारे सामने है. वहां परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को लेकर एक जनमत संग्रह हुआ था और लोगों ने उन्हें बंद करने के पक्ष में मतदान किया था. लेकिन हक़ीक़त ये है कि स्वीडन के परमाणु ऊर्जा संयंत्र आज भी चल रहे हैं.

कहा जा सकता है कि जर्मनी की चांसलर दरअसल आज के हालात में जो जनविरोध है उसे शांत करने की कोशिश कर रही हैं. लेकिन सरकार के इस फ़ैसले का इतना अर्थ तो ज़रूर है कि आनेवाले समय में जर्मनी में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का विस्तार नहीं हो सकेगा, उस पर प्रश्नचिन्ह तो लग ही गया है.

जर्मनी की ऊर्जा ज़रूरत का क़रीब 25 फ़ीसदी हिस्सा परमाणु ऊर्जा से आता है. क्या आनेवाले 10-11 सालों में जर्मनी की सरकार इतनी सक्षम है कि परमाणु ऊर्जा की जगह वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर काम कर सके.

ये बहुत अच्छा सवाल किया आपने. देखिए जर्मनी उन चंद देशों में आता है जिसने सौर ऊर्जा के क्षेत्र में बहुत काम किया है.

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Image caption परमाणु ऊर्जा के विरोध में प्रदर्शन

सौर ऊर्जा के क्षेत्र में नई तरह की तकनीक और इससे जुड़े तमाम पहलुओं पर जर्मनी में बहुत काम हुआ है. जर्मनी को सौर ऊर्जा के क्षेत्र में कुछ हद तक सुपरपावर माना जाने लगा है और दूसरी तरफ़ जर्मनी की भौगोलिक अवस्थिति ऐसी है कि वो रूस से बड़ी आसानी से गैस हासिल कर सकता है.

पाइपलाइन वगैरह बन चुकी हैं. गैस को लेकर दोनों देशों की सरकारों के बीच बातचीत भी चल रही है. मैं एक उदाहरण देना चाहूंगा कि इटली में जब लोगों ने विरोध किया तो वहां परमाणु ऊर्जा के उत्पादन के लिए रिएक्टर नहीं लगाए गए. लेकिन इटली ने अपनी ऊर्जा ज़रूरत की पूर्ति जर्मनी से बिजली लेकर की जो कि परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में उत्पादित बिजली थी.

इसलिए जर्मनी अगर ख़ुद परमाणु ऊर्जा का उत्पादन नहीं करता तो वो पड़ोसी फ्रांस से परमाणु ऊर्जा का आयात कर सकता है, अन्य देशों से ऊर्जा का आयात कर सकता है, रूस से गैस का आयात कर सकता है. पच्चीस फ़ीसदी एक बड़ी मात्रा होती है और जर्मनी 2022 तक इस ऊर्जा ज़रूरत को अन्य स्रोतों से पूरा करना चाहता है तो भी ये मुश्किल लक्ष्य नहीं है.

लेकिन ये भी सच है कि परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में जिस तरह का अनुसंधान और विकास हो रहा है उससे आने वाले पाँच-दस सालों में परिदृश्य बदलेगा. आज जितनी तरह की शंकाएं परमाणु ऊर्जा को लेकर व्यक्त की जा रही हैं, हो सकता है कि उसमें काफ़ी बदलाव आ जाए.

अगर ऐसा होता है तो जर्मनी की सरकार अपने फ़ैसले पर दोबारा विचार भी कर सकती है जैसा कि स्वीडन के मामले में हमने देखा था. अभी परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में सुरक्षा को लेकर जिस तरह के अनुसंधान हो रहे हैं उससे लगता है कि आने वाले 7-8 सालों में ये संभव हो सकेगा कि फुकुशिमा जैसे परमाणु हादसे को रोका जा सकेगा, कम से कम नए संयंत्रों के मामले में.

ये तो फुकुशिमा परमाणु संयंत्र में हुए हादसे और उसके बाद विकसित देशों में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के विरोध की बात हुई लेकिन अगर हम भारत की बात करें तो भारत में तमाम विरोध प्रदर्शनों के बावजूद जो सरकार है वो परमाणु ऊर्जा को लेकर पीछे हटने की बजाए लगातार आगे बढ़ रही है, ज़्यादा से ज़्यादा परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाना चाहती है. तो क्या सरकार को परमाणु ऊर्जा के विस्तार की योजना पर आगे बढ़ना चाहिए या इस पर थोड़ा पुनर्विचार करने की ज़रूरत है.

देखिए, फुकुशिमा का जो हादसा हुआ उससे हमें सबक तो सीखना पड़ेगा. दूसरी बात ये कि भारत की सरकार परमाणु ऊर्जा को जिस नज़रिए से देखती है यानि आलोचनाओं से परे, जिसपर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता, परमाणु ऊर्जा के ख़िलाफ़ बात करना एक तरह से राष्ट्रविरोधी है. मुझे लगता है कि सरकार की ये मानसिकता बेहद पुरानी है, इसे बदलने की ज़रूरत है.

Image caption महाराष्ट्र के जैतापुर में परमाणु संयंत्र का विरोध

आप किसी इलाके में जाकर परमाणु ऊर्जा प्लांट लगाना चाहते हैं वो भी 10 हज़ार मेगावॉट, छह हज़ार मेगावॉट या एक हज़ार मेगावॉट का ही तो उस इलाके में रहने वाले लोगों के मन में प्लांट को लेकर जो सवाल हैं, जो शंकाएं हैं उसका जवाब दिया जाना चाहिए. इलाक़े के लोगों को इस पूरी प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाना चाहिए.

लेकिन हो ये रहा है कि लोगों से कहा जाता है कि परमाणु संयंत्र लगाने का फ़ैसला दिल्ली में लिया गया है. फ्रांस के राष्ट्रपति आए थे तो इस बारे में फ़ैसला लिया गया था, अब प्लांट तो लगेगा ही, आपको पसंद हो या न हो. ये जो पूरी सोच है ये 70 के दशक की सोच है.

सरकार को परमाणु ऊर्जा के विस्तार की पूरी नीति में पारदर्शिता लानी चाहिए. जहाँ कहीं भी परमाणु संयंत्र लगने हैं वहां की जनता से संवाद किया जाना चाहिए. उनको भरोसे में लिया जाना चाहिए. और अगर सरकार को लगता है वो लोगों को समझा पाने की स्थिति में नहीं है तो उनपर फ़ैसले थोपने की बजाए अनुकूल माहौल बनने का इंतज़ार करना चाहिए.

भारत के संदर्भ में मैं सरकार का समर्थन करता हूं कि यहाँ और परमाणु संयंत्र लगने चाहिए. फ़्रांस के मामले में हमने देखा है कि उसने ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता परमाणु ऊर्जा से ही हासिल की है. वहां कोई ऐसी दुर्घटना भी नहीं हुई है.

भारत की 51 फ़ीसदी ऊर्जा कोयले से आती है, कोयले से प्रदूषण होता है और भारत को इसका आयात भी करना पड़ता है. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कोयले की क़ीमत काफ़ी बढ़ भी गई है.

भारत की ऊर्जा ज़रूरत का 36 फ़ीसदी हिस्सा तेल से पूरा किया जाता है. तेल का 80 फ़ीसदी आयात किया जाता है, इससे भी वातावरण का प्रदूषण होता है. ग्यारह फ़ीसदी ऊर्जा गैस से पैदा होती है. इसका भी आयात होता है और इसे भी पूरी तरह स्वच्छ नहीं कहा जा सकता. कुल मिलाकर ऊर्जा ज़रूरतों के लिए भारत की पूरी तरह निर्भरता जीवाश्म ईंधन पर है.

ऐसे देश में ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए परमाणु संयंत्र लगाना, उसका विस्तार करना एक सही नीति है. लेकिन सरकार को ये सुनिश्चित करना होगा कि फुकुशिमा जैसा परमाणु हादसा भारत में नहीं हो और अगर हादसा होता है तो उसका कौन ज़िम्मेदार होगा इसका फ़ैसला पहले होना चाहिए.

इसमें पारदर्शिता होनी चाहिए. जब कभी भी परमाणु ऊर्जा की बात होती है तो सरकार उसके साथ ऐसा बर्ताव करती है जैसा कि रॉ या सशस्त्र बल के साथ किया जाता है जो कि ग़लत है. परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में पूरी पारदर्शिता होनी चाहिए. एक-एक सूचना वेबसाइट पर दी जानी चाहिए. जहां कहीं भी संयंत्र लगाए जा रहे हैं वहाँ के लोग अगर विरोध कर रहे हैं तो उनके साथ संवाद होना चाहिए. उनको भरोसे में लेने के बाद ही सरकार को आगे बढ़ना चाहिए.

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Image caption जैतापुर परमाणु संयंत्र स्थल

सबसे अहम बात ये कि अगर विदेशी कंपनियों को भारत में संयंत्र लगाने की अनुमति दी जाती है तो इसमें कोई बुराई नहीं है. भारत की कंपनियां विदेश में जाती हैं, विदेशी कंपनियों को भी भारत आना चाहिए.

लेकिन ये विदेशी कंपनियाँ किस तरह की तकनीक लेकर आ रही हैं, उसकी ज़िम्मेदारी किसकी है, अगर कोई हादसा होता है तो उसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा, किस हद तक लेगा, मुआवज़े से संबंधित क़ानून क्या हैं. इन सवालों के जवाब दिए बिना सरकार को आगे नहीं बढ़ना चाहिए. भोपाल त्रासदी का उदाहरण हमारे सामने है. दुर्घटना के क़रीब 30 साल बाद भी मुआवज़े का मामला पूरी तरह से सुलझाया नहीं जा सका है.

इसीलिए ये पहले ही तय हो जाना चाहिए कि अगर फुकुशिमा जैसा हादसा भारत में होता है तो इससे किस तरह निपटा जाएगा. यानि इसके क़ानूनी पहलू, विनियमन और पारदर्शिता से जुड़े हर सवाल का पूरा जवाब दिया जाना चाहिए. तभी सरकार को इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए.

एक बात और कि सौर ऊर्जा के विकास के लिए भारत में बहुत अनुकूल परिस्थितियाँ हैं. सरकार को सौर ऊर्जा के विकास में पूरी ताक़त झोंक देनी चाहिए. साथ ही परमाणु ऊर्जा का भी विकास करना चाहिए लेकिन ये सोचना कि परमाणु ऊर्जा कोई जादू की छड़ी है, तो मेरे हिसाब से ये ठीक नहीं है.

भारत को अपना सबसे ज़्यादा ध्यान सौर ऊर्जा पर केंद्रीत करना चाहिए. भारत में जहां-जहां तेल और गैस के भंडार मिल रहे हैं, वो सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए. जहां-जहां कोयला है उसको साफ़ तरीक़े से निकालना प्राथमिकता होनी चाहिए और साथ में परमाणु ऊर्जा के विकास पर भी ज़ोर दिया जाना चाहिए, लेकिन इन सबके लिए ज़रूरी है कि सरकार का रवैया पारदर्शी हो, जनता के हित में हो, पर्यावरण के हित में हो.

(बीबीसी संवाददाता अमरेश द्विवेदी की बातचीत पर आधारित)

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