'2030 तक खाद्य सामग्री दोगुनी महंगी'

गेहूँ की फ़सल
Image caption रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन का व्यापक असर हो रहा है

ब्रिटेन की सहायता एजेंसी ऑक्सफ़ैम ने चेतावनी दी है कि यदि विश्व खाद्य व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया तो अगले 20 वर्षों में मुख्य खाद्य पदार्थों की क़ीमतें दोगुनी हो सकती हैं.

एजेंसी ने कहा है कि वर्ष 2030 तक मुख्य कृषि उपजों के मूल्य में 12 से 18 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी हो सकती है.

बेहतर भविष्य पर जारी अपनी रिपोर्ट में ऑक्सफ़ैम ने कहा है कि क़ीमतों में बढ़ोत्तरी की आधी वजह जलवायु परिवर्तन होगी.

ऑक्सफ़ैम ने वैश्विक नेताओं से अपील की है कि वे खाद्य बाज़ार के नियमन में सुधार करें और जलवायु परिवर्तन कोष में अधिक सहयोग दें.

ऑक्सफ़ैम की मुख्य कार्यकारी अधिकारी बारबरा स्टॉकिंग ने कहा है, "यदि हमें जलवायु परिवर्तन, खाद्य पदार्थों की लगातार बढ़ती क़ीमतें, ज़मीन, पानी और बिजली में कमी जैसी चुनौतियों से निपटना है तो हमें खाद्य व्यवस्था में सुधार लाना होगा."

अपील

अपनी रिपोर्ट में ऑक्सफ़ैम ने चार ऐसे क्षेत्रों को चिन्हित किया है जहाँ खाद्य असुरक्षा है और जो अपने नागरिकों को खाद्यान्न उपलब्ध करवाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

उधर विश्वबैंक ने भी चेतावनी दी है कि खाद्य पदार्थों की बढ़ती क़ीमतें लाखों लोगों को ग़रीबी की ओर ले जा रही है.

अप्रैल में विश्व बैंक ने कहा था कि मध्यपूर्व और उत्तरी अफ़्रीका में संकट की वजह से खाद्यान्न की क़ीमतों में 36 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी हो गई है.

सहायता एजेंसी ऑक्सफ़ैम चाहती है कि दुनिया भर की सरकारों को खाद्य बाज़ारों को संचालित करने के लिए नए नियमों पर सहमति बनानी होगी जिससे कि ग़रीबों को भूख से बचाया जा सके.

एजेंसी की प्रमुख बारबरा स्टॉकिंग का कहना है, "अनजाने में ही हम एक संकट की ओर बढ़ रहे हैं जिसे टाला जा सकता है. यह एक तथ्य है कि दुनिया में हर किसी को भोजन उपलब्ध करवाने की क्षमता है लेकिन फिर भी आज सात में से एक व्यक्ति भूखा है."

खाद्यान्न की क़ीमतों पर होने वाले असर के बारे में ऑक्सफ़ैम का कहना है कि सबसे गंभीर असर जलवायु परिवर्तन का होगा.

ऑक्सफ़ैम का कहना है कि दुनिया भर के नेताओं को चाहिए कि वे दिसंबर में दक्षिण अफ़्रीका में होने वाले जलवायु परिवर्तन सम्मेलन से पहले ही जलवायु परिवर्तन कोष की स्थापना कर लें जिससे कि लोगों को जलवायु परिवर्तन के असर से बचाया जा सके और वे अपनी ज़रुरत की खाद्य सामग्री पैदा करने के लिए बेहतर ढंग से तैयार रह सकें.

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