फ़ौज की वापसी के बाद आर्थिक संकट का ख़तरा

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Image caption अनुदान की बदौलत स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या में सात गुना बढ़ोतरी हुई है.

अमरीकी सेनेट की एक प्रभावशाली समिति ने चेतावनी दी है कि 2014 में अमरीकी फ़ौज की वापसी के बाद अफ़गानिस्तान भारी आर्थिक संकट में घिर सकता है.

सेनेट की विदेशी मामलों की समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है अमरीका अफ़गानिस्तान को हर महीने 32 करोड़ डॉलर का अनुदान देता है और ज़रूरी है कि उसका इस्तेमाल सही तरीके से हो.

समिति का कहना है कि विदेशी अनुदान का ग़लत इस्तेमाल भ्रष्टाचार को बढ़ावा देगा.

रिपोर्ट में कहा गया है अनुदान का दो तिहाई हिस्सा देश के दक्षिण और पूर्वी हिस्सों में खर्च किया जा रहा है जहां तालिबान के साथ भारी लड़ाई हुई है.

इसका उद्देश्य है उन इलाकों में लोगों के दिल और दिमाग पर जीत की कोशिश जहां तालिबान का नियंत्रण था.

दूरगामी विकास

सांसदों का कहना है कि इस तरह के अनुदान से थोड़े समय के लिए तो स्थिरता आ सकती है लेकिन दूरगामी विकास नहीं सकता.

उनका कहना है कि अफ़गानिस्तान अब लगभग पूरी तरह से विदेशी अनुदान पर निर्भर हो गया है और वाशिंगटन से आ रहा पैसा स्थानीय बाज़ारों में मजदूरी की दर को असंतुलित रूप से बढ़ा रहा है और भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा दे रहा है.

नैटो गठबंधन के सैनिकों की वापसी 2014 में होनी है.

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Image caption अनुदान का ज़्यादा हिस्सा उन इलाकों में खर्च हुआ है जहां अमरीकी फ़ौज तालिबान के ख़िलाफ़ भीषण लड़ाई में उलझी है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि अभी से उसके बाद के लिए योजना नहीं बनी तो अफ़गानिस्तान गहन आर्थिक संकट में घिर जाएगा.

विदेशी अनुदान की वजह से जो बदलाव दिखते हैं वो हैं स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या में सात गुना वृद्धि और स्वास्थय सेवाओं में बेहतरी.

लेकिन रिपोर्ट का कहना है कि अमरीका को इस बात पर ख़ास तौर से ग़ौर करने की ज़रूरत है कि ये पैसा किस तरह से खर्च होता है और किस तरह हर काम के लिए ठेकेदारों पर बहुत ज़्यादा निर्भरता है.

रिपोर्ट का कहना है, “योजना ऐसी हो जो अनुदान को अचानक बंद करने की जगह उसे धीरे-धीरे कम करने पर ध्यान दे. अचानक कटौती भारी आर्थिक मंदी ला देगा.”

अमरीकी कांग्रेस में अब अफ़गानिस्तान युद्ध उबाऊ होता नज़र आ रहा है. फ़ौज की जल्द से जल्द वापसी पर बहस तेज़ हो रही है और अफ़गानिस्तान में अमरीकी मौजूदगी से होने वाले आर्थिक खर्च पर भी तीखे सवाल उठ रहे हैं.

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