अमरीकी शैली पर भारतीय थिरकन

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सोलह साल का चंदन अपने सर के बल इतने चक्कर लगाता है कि आपको चक्कर आ जाए.

चंदन 30 नौजवानों के इस ग्रुप में अनोखा नहीं है. हर कोई ऐसे करतब और इससे भी हैरतअंगेज़ कारनामे करता है.

इनके ग्रुप का नाम फिकटिश्यस ग्रुप है और ये हिप-हॉप करते हैं.

हिप-हॉप की उपज न्यूयार्क की सड़कों पर हुई. ख़ासतौर पर काले लोगों की आबादी वाले इलाकों में ये काफ़ी लोकप्रिय है.

लंबी टीशर्ट, टोपी, ढीली ढाली पैंट और एक तरह से समाज के कथित मुख्य धारा को चुनौती देने वाले अंदाज़ की इस नृत्य शैली ने अमरीका के बाहर अपनी लोकप्रियता जल्दी ही हासिल कर ली लेकिन ये इस तरह भारत के छोटे शहरों में और उपनगरों में इतना लोकप्रिय हो जाएगा, इससे लोग हैरत में हैं.

मुंबई की सीमाओं से परे

पिछले दो सालों में भारत के सबसे बड़े टीवी टैलेंट शो में इन स्ट्रीट डांसरों की खा़स तौर पर हिप हॉप करने वालों की तूती बोलती है.

फ़िक्टिश्यिस ग्रुप

वर्नन और सुरेश के ग्रुप ने कई पुरस्कार जीते हैं

मुम्बई की सीमा से निकल जैसे ही आप नालासोपारा और वसई जैसे ग़रीब उपनगरों में जाएंगे, हिप-हॉप सीखाने वाले डांस स्कूलों की भरमार है. यहां कुछ ही सालों में इन इलाकों में कम से कम बीस बड़े डांस ग्रुप बन चुके है.

वर्नन और सुरेश ने अपने ग्रुप का नाम 'फ़िकटीश्यस' रखा है.

वर्नन कहते है कि ये इतनी लोकप्रिय शैली हो गई है कि बच्चा-बच्चा इसे सीखने लगा है.

''अगर आप किसी कॉलेज फ़ेस्टीवल में जाएं तो आपको हर जगह हिप-हॉप करते हुए लोग मिल जाएंगे. किसी भी डांस प्रतियोगिता में आप जाएं, हिप हॉप का राज है.''

पर एक बात अचरज की ये ज़रूर है कि आख़िर निम्न मध्यवर्गीय इलाक़ों में इस शैली की धूम क्यों है. सुरेश मुकुंद ख़ुद एक ऐसे ही इलाक़े में रहते हैं.

फ़िक्टिशियस ग्रुप के कोरियोग्राफ़र भी हैं.

''दरअसल इन इलाकों में आर्थिक संकट के कारण ज़्यादातर बच्चे पढ़ाई नहीं कर पाते हैं. इसीलिए वो सोचते हैं कि अगर नौकरी न मिले तो कम से कम हिप हॉप डांस करके ही रोज़ी चला लें और बस ग्रुप बनते गए. अब तो ये नशा सा है नौजवानों के लिए इन इलाकों में.''

इन हिप-हॉप के दीवानों को बड़े शिक्षकों ने नहीं सिखलाया ना ही वे किसी बड़े डांस स्कूलों में गए. ये ज़्यादातर ख़ुद से सीखे सीखाए हैं.

प्रोसेनजीत कुंडु

प्रोसेनजीत न्यूयार्क से अब मुम्बई में आ बसे

यू-ट्यूब और हॉलीवुड की फ़िल्में देख देखकर आज वे ख़ुद इस कला के माहिर हो गए हैं.

इस नए बुख़ार ने प्रोसनेजीत कुंड़ु जैसे न्यूयार्क में सीखे नर्तकों को मुम्बई तक खींच लिया है. वे पिछले पांच साल से मुम्बई में नौजवानों को ये विधा सिखा रहे हैं.

''यहां ये नृत्य शैली वायरस की तरह फैली है. इन बच्चों के पास जूते नहीं है लेकिन वे प्रैक्टिस करते रहते हैं. यहां जिस गति से लोगों का रूझान इस शैली की तरफ़ बढ़ रहा है वो अमरीका या किसी भी दूसरे देश से से कहीं ज्यादा तेज़ है. कुछ सालों में देखिएगा यहां के हिप-हॉप डांसर अंतरराष्ट्रीस स्तर पर छा जाएंगे.''

इसमें कोई शक नहीं कि जुनून सर चढ़ कर बोल रहा है. शायद यही वजह है कि अब तक पुरूषों के वर्चस्व वाली इस नृत्य शैली में अब लड़िकयों ने भी अपना पांव जमाना शुरू कर दिया है.

इस शैली पर केवल लड़कों का वर्चस्व रहा है लेकिन मै कई लडकियों को जानती हूं जो कि इसी शैली में अपने आपको वयक्त करना चाहती हैं इसीलिए मैंने ये ग्रुप बनाया. वैसे लोगों को जब पता चलता है कि मै हिप हाप डांस करती हू, तो थोड़ा चौकंते जरूर हैं."

केवल लड़कियों के ग्रुप अर्बनईस्ट को शुरू करने के पीछे प्रिया की अपनी दलीलें हैं.

"इस शैली पर केवल लड़कों का वर्चस्व रहा है लेकिन मै कई लडकियों को जानती हूं जो कि इसी शैली में अपने आपको वयक्त करना चाहती हैं इसीलिए मैंने ये ग्रुप बनाया. वैसे लोगों को जब पता चलता है कि मै हिप-हाप डांस करती हूं, तो थोड़ा चौंकते जरूर हैं."

अड़चनें जो भी हों इसमें शक़ नहीं कि इन शैलियों का ज़ोर चल पड़ा है.

पारंपरिक बनाम आधुनिक

सवाल मन में ये उठता है कि अमरीका से उपजी ये शैली अपने साथ उस देश की संस्कृति का तामझाम भी लेकर आती है. क्या इससे भारत की पांपरिक शैलियों को ख़तरा है. रमा वैद्यनाथन जानी-मानी भरतनाट्यम नृत्यागंना है.

वे कहती है कि ख़तरे की कोई बात नहीं है और ये शैलियां आधुनिक समय की हैं, इनसे नज़रें चुरा नहीं सकते ना चुराना चाहिए. वे कहती हैं कि हम सब साथ साथ अपनी जगहों पर रह सकते हैं

हिप-हॉप हो, अर्बन शैलियां हों या शास्त्रीय नृत्य, मंच इतना बड़ा है कि हर को अपनी जगह मिल सकती है.

ढलती शाम में अपने हुनर को तराशते पार्कों में ये नौजवान न तो जगह की कमी के मोहताज हैं ना अवसरों के.

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