अफ़्रीका में ज़मीनों पर क़ब्ज़ा

Image caption विदेशी कंपनियां जमीनें हथिया रही हैं

एक अमरीकी थिंक टैंक के मुताबिक़ अफ़्रीका में हेज फंड (एक तरह का निजी निवेश) निवेशक खाद्य और जैव ईंधन के क्षेत्र में अपना मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए ज़मीनें हथिया रहे हैं.

अपनी एक रिपोर्ट में ओकलैंड इंस्टीट्यूट ने कहा है कि हेज फंड और दूसरी विदेशी कंपनियों ने अफ़्रीका में बड़े पैमाने पर जमीनें हथिया ली हैं और कई मामलों में सही तरीक़े से क़रार भी नहीं किया है.

इन भूमि अधिग्रहणों की वजह से लाखों छोटे काश्तकार विस्थापित हो गए हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक़ विदेशी कंपनियां इन ज़मीनों के ज़रिए वैश्विक खाद्य बाज़ार पर अपनी पकड़ मज़बूत बनाए रखती हैं.

ये कंपनियां इन ज़मीनों से जैव ईंधन और कटे फूल हासिल करती हैं जिसका निर्यात किया जाता है.

रिपोर्ट के मुताबिक़,''इससे वैश्विक खाद्य व्यवस्था में असुरक्षा पैदा हो रही है जो कि चरमपंथ से भी बड़ी समस्या हो सकती है.''

ओकलैंड इंस्टीट्यूट ने इथियोपिया, तंज़ानिया, दक्षिणी सूडान, सिएरा लियोन, माली और मोज़ांबिक के भूमि सौदों का अध्ययन करने के बाद ये जानकारियां सार्वजनिक की हैं.

जोख़िम भरे दावपेंच

रिपोर्ट के मुताबिक़ हेज फंड्स और दूसरे सट्टेबाज़ों ने केवल 2009 में अफ़्रीका में करीब छह करोड़ हेक्टेयर भूमि या तो ख़रीदी या पट्टे पर ली जो कि फ़्रांस के क्षेत्रफल के बराबर है.

रिपोर्ट कहती है, ''इन्हीं वित्तीय कंपनियों ने रियल एस्टेट क्षेत्र में बढ़ोतरी का बुलबुला बनाकर जोख़िम भरे वित्तीय दावपेंच के ज़रिए हमें वैश्विक मंदी की ओर धकेल दिया था. यही कंपनियां अब वैश्विक खाद्य आपूर्ति को प्रभावित कर रही हैं.''

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि कुछ कंपनियों ने भोले-भाले किसान नेताओं और भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों से क़रार कर भूमि हासिल की है.

सच का पर्दाफ़ाश

ओकलैंड इंस्टीट्यूट की कार्यकारी निदेशक अनुराधा मित्तल का कहना है,''इस शोध ने उन निवेशकों का पर्दाफ़ाश कर दिया है जो ये मानते रहे हैं कि ग़रीब कबीलाई मुखिया को एक बोतल जॉनी वॉकर व्हिस्की देकर उनसे कुछ भी हासिल किया जा सकता है.''

Image caption पूर्वी अफ़्रीका में भोजन संकट

वो आगे कहती हैं,'' जब ये निवेशक स्थानीय नेताओं को तरक्क़ी और नौकरी का वादा करते हैं तो सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन वो अपना वादा पूरा नहीं करते.''

रिपोर्ट के मुताबिक़ क़रार में इन निवेशकों को कई तरह की और सुविधाएं भी दी जाती हैं जिनमें पानी की असीमित आपूर्ति से लेकर करों में छूट भी शामिल होती है.

अमरीका आधारित एक अभियान समूह सॉलिडैरिटी मूवमेंट ऑर न्यू इथियोपिया के ओबांग मेथो का कहना है,''किसी को इस पर यक़ीन नहीं करना चाहिए कि ये निवेशक भूखे अफ़्रीकियों का पेट भरने आए हैं. इन समझौतों से केवल भ्रष्ट नेताओं और विदेशी नेवेशकों की जेबों में डॉलर जाएंगे.''

हालांकि रिपोर्ट में शामिल कई कंपनियां इन आरोपों से इनकार करते हुए कहती हैं कि अफ़्रीका में उनकी मौजूदगी हानिकारक नहीं है.

एमवेस्ट एसेट मैनेजमेंट नाम की एक कंपनी ने मज़बूती से इस बात का खंडन किया है कि वो ग़ैर क़ानूनी और शोषक गतिविधियों में शामिल है.

एमवेस्ट के अफ़्रीका निदेशक एंथोनी पूर्टर ने बीबीसी को बताया,''कोई क़रार ग़ैरक़ानूनी नहीं है. हमने सभी ज़मीनें क़ानूनी निविदा से हासिल की हैं.

उन्होंने बताया कि मोज़ांबिक में कंपनी के कर्मचारी न्यूनतम मजदूरी से 40 फ़ीसदी ज़्यादा वेतन पाते हैं. साथ ही कंपनी वहां विकास की कई परियोजनाओं से जुड़ी है जैसेकि ग्रामीण समुदाय को साफ पानी की आपूर्ति करना. उन्होंने कहा कि लोग इससे बेहद ख़ुश भी हैं.

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