चीन बढ़ा रहा है सैन्य ताक़त

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दक्षिण चीन सागर में नौसैनिक होड़ लगी हुई है. चीन बड़ी तेज़ी से अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाता जा रहा है जिससे कि वो अपने तटों से काफ़ी आगे तक अपनी ताक़त दिखा सकता है.

चीन पहले से ही अपने क्षेत्र की सबसे बड़ी नौसैनिक शक्ति है और उसके पास जो नए सैन्य साजोसामान हैं, उनसे एक दिन वो अमरीकी नौसेना से भी आगे निकल सकता है.

इसलिए ये अचरज की बात नहीं कि उसके कई पड़ोसी चिंतित हैं, विशेष रूप से वियतनाम और फ़िलीपींस जिनके साथ चीन का समुद्री जल सीमा विवाद वर्षों पुराना है.

यूएस नेवल वॉर कॉलेज में चीन विशेषज्ञ डॉक्टर एंड्र्यू एरिक्सन कहते हैं,"चीन युद्ध शुरू नहीं करना चाहता, मगर वो अपनी सैन्य ताक़त को ऐसा करना चाहता है जिससे कि वो बिना लड़े ही जीत जाए, ऐसी कार्रवाइओं का विरोध कर जो उसे लगता है कि उसके राष्ट्रीय हितों के लिए नुक़सानदेह हैं."

तीन शक्तियाँ

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Image caption चीन ने इस साल के आरंभ में युद्धपोत बनाने की बात को स्वीकार किया था

चीन की बढ़ती सैन्य ताक़त के परिचायक हैं उसकी तीन सैन्य क्षमताएँ.

इनमें पहला है विमानवाहक युद्धपोत. चीन ने अपना पहला विमानवाहक युद्धपोत बनाया है जिसे इस साल परीक्षण के लिए समुद्र में उतारा जाएगा.

इसके बाद आता है स्टेल्थ फ़ाइटर या ऐसा विमान जो रडार की पकड़ में नहीं आता. पिछले साल के अंत में पहली बार चीन के स्टेल्थ फ़ाइटर विमान की तस्वीर लीक होकर सामने आई.

इसके अतिरिक्त अमरीकी सैन्य विशेषज्ञों को लगता है कि चीन ने दुनिया के पहले लंबी दूरी के बैलिस्टिक मिसाइलों को तैनात करना शुरू कर दिया है जो समुद्र में चलते जहाज़ों को निशाना बना सकते हैं.

डॉक्टर एरिक्सन अभी तक चीन का ध्यान ऐसी रणनीति पर था जिससे कि उसकी क्षेत्रीय ताक़त को कोई चुनौती ना मिल सके और ताइवान को आज़ादी की घोषणा करने से रोका जा सके.

कुछ हद तक इस रणनीति के तहत चीन ऐसे भरोसेमंद हथियारों का विकास करना चाहता था जिससे कि अमरीका के हस्तक्षेप की स्थिति में अमरीकी विमानवाहक युद्धपोतों को अपनी ओर बढ़ने से रोका जा सके.

चीन की मारक क्षमता

चीन के पास मिसाइलों और दूसरे हथियारों की ऐसी खेप है जिनसे कि वो अपनी सीमा से काफ़ी दूर तक मार कर सकता है.

इनमें डीएफ़-21डी युद्धपोत रोधी बैलिस्टिक मिसाइल विशेष हैं. इन मिसाइलों के द्वारा ज़मीन पर स्थित अड्डे से उन अमरीकी विमानवाहक युद्धपोतों पर निशाना लगाया जा सकता है जो कि लंबे समय से अमरीकी नौसैनिक ताक़त का आधार हुआ करते थे.

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Image caption डीएफ़ 21 मिसाइल डेढ़ हज़ार किलोमीटर से भी अधिक दूर तक निशाना लगा सकते हैं

पश्चिमी देशों में सीएसएस-5 के नाम से जानी जानेवाली डीएफ़-21डी मिसाइल किसी वाहन से दागी जा सकती है और इसकी क्षमता 1500 किलोमीटर से अधिक है.

इसपर बदले जा सकनेवाले ऐसे आग्नेयास्त्र लगे होते हैं जिनसे चीनी सेना पश्चिमी प्रशांत महासागर में जहाज़ों पर हमले कर सकती है.

अमरीकी अधिकारियों और ताइवान के राष्ट्रीय सुरक्षा ब्यूरो के महानिदेशक का कहना है कि चीन इन मिसाइलों को तैनात करना शुरू भी कर चुका है.

ये समझना आसान है कि चीन क्यों ऐसे मिसाइल चाहता है. ये सारा खेल इस क्षेत्र में सबसे बड़ी सैन्य शक्ति – अमरीका – पर लगाम लगाने का है ताकि ताइवान को लेकर कभी संकट की स्थिति आए तो अमरीका के हाथ बाँधे जा सकें.

विमानवाहक युद्धपोत

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान प्रशांत महासागर में हुई सैन्य कार्रवाइयों के बाद से ही विमानवाहक युद्धपोत नौसैनिक शक्ति को प्रदर्शित करने के सबसे बड़े साधन बन गए हैं.

अमरीकी युद्धपोत पर कई विमानपट्टियाँ होती हैं जिनपर कई तरह के विमान होते हैं जो कई तरह के अभियानों में हिस्सा ले सकते हैं.

हर युद्धपोत के साथ और उसकी रक्षा के लिए कई युद्धपोत और पनडुब्बियाँ होते हैं.

चीन भी अब इस दौड़ में शामिल हो गया है, हालाँकि उसकी शुरूआत दूसरे तरह से हुई है. उसने यूक्रेन से सोवियत दौर का एक विमानवाहक युद्धपोत – वारयाग – ख़रीदा और फिर उसमें व्यापक बदलाव किए.

चीन के पहले विमानवाहक युद्धपोत पर नए जे-15 फ़्लाइंग शार्क लड़ाकू विमान होंगे जो कि रूसी सुखोइ एसयू-33 जेट विमानों की तकनीक पर आधारित हैं.

प्रतिष्ठित जर्नल – एविएशन वीक एंड स्पेस टेक्नोलॉजी – के अनुसार चीन ने एसयू-33 विमानों के डिज़ाइन भी यूक्रेन से ही हासिल किए हैं.

ऐसा कहा जा रहा है कि ये विमानवाहक युद्धपोत इस साल समुद्र में परीक्षण के लिए उतार दिए जाएँगे.

इनके नौसैनिके बेड़े में शामिल होते ही चीनी नौसेना की क्षमता उल्लेखनीय रूप से बढ़ जाएगी.

मगर पश्चिमी विशेषज्ञ इस बिन्दु पर ध्यान दिलाते हैं कि ये युद्धपोत मुख्य रूप से प्रशिक्षण देने में काम आएगा. युद्धपोतों का संचालन बहुत ही अधिक विशेषज्ञता का काम होता है और इसे हासिल करने में समय लगता है.

अभी इस बात की संभावना कम ही है कि चीनी विमान ऐसे विमानों को तैनात कर सके जो कि अमरीकी युद्धपोतों पर होते हैं.

बड़ी महत्वाकांक्षाएँ

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Image caption चीन के जे-20 स्टेल्थ फ़ाइटर विमान ने इसी महीने परीक्षण उड़ान भरी थी

चीन की वायुसैनिक क्षमता भी आहिस्ता-आहिस्ता विकसित हो रही है. पारंपरिक रूप से चीन बड़ी संख्या में अपने यहाँ सोवियत दौर के विमानों की नक़ल कर बनाए हुए विमानों को तैनात किया करता था.

मगर अब जे-20 नामक विमान की बात उजागर होने के बाद चीन ऐसे बहुत कम देशों की क़तार में शामिल हो गया है जिनके पास पाँचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ फ़ाइटर विमान हैं.

इसकी एकमात्र उड़ान इस साल जनवरी में हुई थी, अमरीकी रक्षा मंत्री रॉबर्ट गेट्स की चीन यात्रा से कुछ ही घंटे पहले. कुछ विश्लेषकों ने इस संयोग को चीन की तरफ़ से अमरीका को भेजा गया एक संदेश बताया.

लंदन स्थित संस्था इंटरनेशल इंस्टीच्युट ऑफ़ स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ के विशेषज्ञ डगलस बैरी कहते हैं कि चीन का जे-20 विमान अमरीकी स्टेल्थ फ़ाइटरों की बराबरी नहीं कर सकता.

मगर साथ ही वो कहते हैं कि ये विमान चीन की हवा में मारक क्षमता को लेकर उसकी महत्वाकांक्षा को दर्शाता है.

वैसे वो कहते हैं कि अभी इस विमान को लेकर कई बातें स्पष्ट नहीं हैं और लगता यही है कि ये विमान इस दशक के अंत तक ही सेवा में शामिल किया जा सकेगा.

लेकिन ऐसे में सवाल उठता है कि फिर जे-20 का क्या महत्व रहेगा क्योंकि तबतक अमरीका ऐसे सैकड़ों युद्धक विमान विकसित कर लेगा.

डगलस बैरी कहते हैं कि जे-20 विमानों को शामिल किए जाने से क्षेत्र की दूसरी शक्तियों के लिए और एशिया प्रशांत में अमरीकी सेना के लिए चुनौती बढ़ जाएगी.

लेकिन चीन की इन सारी उपलब्धियों के बीच सारे विशेषज्ञ चीन की मौलिक क्षमता की गुणवत्ता पर संदेह के बारे में एकमत हैं.

अमरीकी सैन्य अधिकारी इस सारे घटनाक्रम पर बारीक़ी से नज़र रखे हुए हैं. चीन ने आनेवाले भविष्य के लिए लक्ष्य तय कर रहा है. मगर कम-से-कम अभी के दौर में जब वो अमरीकी नौसैनिक ताक़त पर नज़र डालेगा, तो उसे केवल ईर्ष्या से काम चलाना होगा.

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