भारतीय कश्मीर की नई आवाज़

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अगर आप भारतीय कश्मीर के किसी भी क्षेत्र में किसी गाड़ी या टैक्सी में सफ़र कर रहे हैं, तो आप देखेंगें कि आम लोगों को दो रेडियो जॉकियों की आवाज़ सुने बिना गाड़ी चलाने में मज़ा नहीं आता.

वफ़ा वकील और सरदार नसीर अली ख़ान भारतीय कश्मीर की नई आवाज़ हैं. दोनों ही घाटी के एकमात्र रेडियो स्टेशन ‘बिग 92.7 एफ़ एम’ के बेहद लोकप्रिय रेडियो जॉकी हैं.

कभी न ख़त्म होने वाली अपनी बातों से इन दोनों रेडियो जॉकियों ने मानो जैसे पूरी घाटी का दिल जीत लिया हो.

आमतौर पर हम गर्मी के मौसम में मंत्रियों और अधिकारियों को कार्यक्रम में बुलाते हैं, क्योंकि गर्मियों में ज़्यादातर मंत्री और अधिकारी राज्य में ही होते हैं. अल्लाह की दुआ से इस कार्यक्रम के ज़रिए ज़्यादातर जन समस्याओं का समाधान निकाला गया है.

वफ़ा वकील, रेडियो जॉकी

रेडियो जॉकी वफ़ा सुबह आठ बजे स्टूडियो में आती हैं. वे अपने रेडियो कार्यक्रम की शुरुआत श्रीनगर के ख़ुशनुमा मौसम की बात करते हुए करती हैं और फिर अपने श्रोताओं को बॉलिवुड संगीत सुना कर उनका मनोरंजन करती हैं.

रेडियो पर हया के नाम से जॉकिंग करने वाली वफ़ा वकील उर्दू भाषा में अंग्रेज़ी शब्दों का मिश्रण करते हुए अपनी मीठी आवाज़ से लोगों को सुबह की नींद से जगाती हैं और कहती हैं, “सलाम आलेकुम. मैं हूं आर-जे हया और सुबह की ताज़गी ले कर मैं आ गई हूं बिग नून चाय (कश्मीरी नमकीन चाय) ले कर. ”

इसके बाद संगीत की आवाज़ बढ़ाते हुए, वे ज़िंदादिली से अपने श्रोताओं का स्वागत करती हैं.

अगले चार घंटों तक अपने ब्रेकफ़ास्ट शो में वफ़ा बॉलिवुड गपशप, संगीत और चर्चित गानों के बारे में बात करती हैं.

रेडियो जॉकी

आर-जे हया पिछले पांच सालों से रेडियो जॉकिंग कर रही हैं और घाटी में इनके हज़ारों प्रशंसक हैं.

बेहद लोकप्रिय

आर-जे हया पिछले पांच सालों से रेडियो जॉकिंग कर रही हैं और घाटी में इनके हज़ारों प्रशंसक हैं.

वफ़ा का कार्यक्रम घाटी के हर भाग में सुना जाता है, यहां तक कि पाकिस्तान के कुछ क्षेत्रों में भी.

वफ़ा कहती हैं, “जिस तरह का प्यार हमें लोगों से मिल रहा है, वो अविश्वसनीय है. कश्मीर में लोग पढ़े-लिखे हैं और उनसे संपर्क करना इतना मुश्किल नहीं है. एक बार एक भारतीय सेना अधिकारी ने सीमा क्षेत्र से मुझे रेडियो पर सुना और मुझसे संपर्क साधा. मेरे प्रशंसक मुझे ई-मेल भी भेजते हैं और मेरे फ़ेसबुक पेज के ज़रिए भी कई लोगों ने मुझसे संपर्क साधा.”

वफ़ा बताती हैं कि हर दिन उनके बहुत से प्रशंसक उन्हें फ़ोन करते हैं, “कुछ लोग अपनी निजी समस्याओं के बारे में मुझसे बात करते हैं, तो कुछ घाटी की समस्याओं के बारे में बात करते हैं. मैं अपनी तरफ़ से उनकी मदद करने की पूरी कोशिश करती हूं.”

बिग नून चाय नाम का रेडियो कार्यक्रम तेज़ी से लोगों में लोकप्रिय होता जा रहा है और आर-जे हया के लिए इस कार्यक्रम पर मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों को स्टूडियो में लाना कोई बड़ी बात नहीं.

वो कहती हैं, “आमतौर पर हम गर्मी के मौसम में ऐसे मेहमानों को कार्यक्रम में बुलाते हैं, क्योंकि गर्मियों में ज़्यादातर मंत्री और अधिकारी राज्य में ही होते हैं. अल्लाह की दुआ से इस कार्यक्रम के ज़रिए ज़्यादातर जन समस्याओं का समाधान निकाला गया है.”

रेडियो जॉकी

आर-जे नासिर कहते हैं कि कश्मीर में रेडियो जॉकिंग करना बेहद पेचीदा काम है.

पेचीदा मामला

भारत में निजी एफ़ एम चैनलों को समाचार प्रसारण करने की इजाज़त नहीं है, लेकिन आर-जे हर दिन अलग-अलग स्त्रोतों से ताज़ा समाचार को चिन्हित कर लेते हैं और अपने कार्यक्रमों में उन मुद्दों पर बहस छेड़ते हैं.

लेकिन भारतीय कश्मीर में आर-जे का काम बेहद पेचीदा होता है.

कश्मीर में साल 1989 से ही भारतीय शासन के ख़िलाफ़ सशस्त्र विरोध जारी है, हालांकि पिछले कुछ सालों में वहां हिंसा में कमी आई है.

पिछले तीन सालों में सरकार और सरकार-विरोधी प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़प में कई लोग मारे जा चुके हैं.

आर-जे नसीर अपने बचपन को याद करते हुए बताते हैं, “कश्मीर में विद्रोह का दौर जब शुरू हुआ, तो मैं उम्र में बहुत छोटा था. मैं चरमपंथ देखते हुए बड़ा हुआ. हालांकि मेरी ज़िदगी काफ़ी हद संरक्षित रुप में बीती लेकिन मैं अपने आस-पास के माहौल से हमेशा वाक़िफ़ रहा.”

पिछली गर्मियों में एक आदमी ने हमें फ़ोन कर बताया कि उसकी परिवार का एक सदस्य घायल हो गया है और उसे खून की ज़रूरत है. उसकी मदद करने के लिए हमने रेडियो कार्यक्रम के माध्यम से लोगों से अपील की कि वे रक्तदान करें और घायल हुए लोगों की मदद करें.

सरदार नसीर अली ख़ान, रेडियो जॉकी

नासिर पिछले दो साल से घाटी में रेडियो जॉकिंग कर रहे हैं. उनका कहना है, “कश्मीर में हम सिर्फ़ आर-जे ही नहीं हैं. लोग हमसे जुड़े हुए हैं. हम जो कहते हैं या करते हैं, उसे बहुत बारीकी से परखा जाता है और कभी कभी लोग हमारी आलोचना भी करते हैं.”

पिछले कुछ साल नासिर के लिए बेहद मुश्किल रहे. घाटी में हुई हिंसा को बेहद दुःखद बताते हुए वे कहते हैं, “हम स्टूडियो में हिंसा के बारे में बात नहीं करते. हमारा काम है लोगों को उनकी परेशानियों से दूर ले जाना. हमें लोगों का दर्द बहुत महसूस हुआ, लेकिन हमें उस मुद्दे से दूर रहना पड़ा.”

आर-जे हया नासिर की हां में हां मिलाते हुए कहती हैं, “रेडियो का माध्यम लोगों के लिए बना है. हमें श्रोताओं के मूड के मुताबिक़ संगीत चलाना पड़ता है. जब भी घाटी में हिंसा होती है, तो हम धीमा या धार्मिक संगीत बजाते हैं. ”

लेकिन ऐसे भी कुछ पल आए हैं, जब ये रेडियो जॉकी खुद को पक्षपाती होने से नहीं रोक पाए. आर-जे नासिर कहते हैं, “पिछली गर्मियों में एक आदमी ने हमें फ़ोन कर बताया कि उसके परिवार का एक सदस्य घायल हो गया है और उसे खून की ज़रूरत है. उसकी मदद करने के लिए हमने रेडियो कार्यक्रम के माध्यम से लोगों से अपील की कि वे रक्तदान करें और घायल हुए लोगों की मदद करें.”

साल 2006 में लांच होने के कुछ ही घंटों के भीतर इस रेडियो चैनल पर 600 संदेश आए. लेकिन आज हज़ारों लोग इस चैनल को प्रशंसा भरे संदेश भेजते हैं. आर-जे हया की मानें तो ‘कश्मीर घाटी में ऐसा कोई ही होगा, जो उन्हें न सुनता हो’.

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