क्या चीन की अर्थव्यवस्था को ख़तरा है?

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दुनिया की विकसित अर्थव्यवस्थाएँ घायल अवस्था में कराह रही हैं और महामंदी के बाद धीरे-धीरे अपने आपको अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रही हैं.

पश्चिमी देशों के उपभोक्ता और सरकारें अपने आपको कर्ज़ से मुक्त करने के लिए संघर्ष कर रही हैं. ये दोनों ही आने वाले समय में उपभोक्ता सामग्रियों और सेवाओं के बड़े स्रोत होंगे, ठीक उसी तरह जैसे वे पिछले दशक में थे.

दूसरी ओर इसके बिल्कुल विपरीत चीन में मंदी के दौर में गति थोड़ी धीमी पड़ी उसके बाद अर्थव्यवस्था अपनी पूरी रफ़्तार से चल पड़ी.

वर्ष 2007 से 2011 तक चीन ने इतनी वैश्विक आर्थिक उन्नति की है जितनी जी-7 देशों ने मिलकर भी नहीं की.

इसके अलावा चीन उपभोक्ता सामग्रियों के आपूर्तिकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्व बाज़ार है. ऑस्ट्रेलियाई कोयला व लोहा और ब्राज़ील का सोयाबीन इसके उदाहरण हैं.

ये कहना ज़रुरी है कि चीन एक बड़ा निर्यातक भी है जो ट्रेड सरप्लस में है. ट्रेड सरप्लस यानी निर्यात से होने वाली उसकी आय आयात में उसके खर्च से अधिक है.

लेकिन चीन का आयात लगातार बढ़ रहा है इसलिए ख़ुद वह कई देशों के लिए एक बड़ा बाज़ार बनता जा रहा है.

कुछ लोगों को चीन को लेकर संशय भी होता है.

वॉल स्ट्रीट जर्नल ने हाल ही में कहा है, "कई बरसों तक मकानों की क़ीमतों के आसमान छूने के बाद अब चीन के प्रॉपर्टी बाज़ार की हवा निकल रही है."

इसके नतीजे ख़राब होते हैं. अमरीका, आयरलैंड, ब्रिटेन और स्पेन के ख़राब प्रॉपर्टी बाज़ार और न चुकने वाले लोन उनके आर्थिक संकट की मुख्य वजह बने.

बढ़ती क़ीमतें

Image caption चीन में बढ़ती महंगाई से लोग परेशान हैं

चीन के अधिकारी महंगाई को लेकर असुविधाजनक स्थित में जाते जा रहे हैं.

हाल ही में कर्ज़ कम करने के लिए चीन के केंद्रीय बैंक ने कई क़दम उठाए हैं.

दूसरी ओर न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर और तीन साल पहले आई आर्थिक मंदी की पहले से चेतावनी देने वाले नॉरियल रॉबिनी चीन के भविष्य को लेकर चेतावनी दे रहे हैं. उनका कहना है कि चीन को 'हार्ड लैंडिग' का सामना करना पड़ सकता है.

उनका मानना है कि चीन की अर्थव्यवस्था निवेश पर बहुत ज़्यादा निर्भर है. वे कहते हैं कि बहुत अधिक निवेश होने से अतिरिक्त क्षमता तो पैदा होती है लेकिन वह टिकाऊ नहीं हो सकती.

ऐसे में हो ये सकता है कि कर्ज़ की बड़ी समस्या खड़ी हो जाए जब कर्ज़ लेकर मकान या व्यावसायिक भवन बनाने वालों को ये समझ में आए कि उन्हें वैसी आय नहीं हो रही है जैसी कि उन्होंने कल्पना की थी.

इसकी वजह से लोगों को शहरों की तरफ़ आना कम होगा लेकिन क्या इससे चीन की आर्थिक विकास भी धीमा पड़ेगा?

शहरों की ओर

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Image caption विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले दिनों में शहरों की ओर लोगों को आना घटेगा

अगर दूर भविष्य पर नज़र डालें तो कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो चीन के आर्थिक विकास को धीमा कर सकते हैं.

इसका एक महत्वपूर्ण पहलू ये है कि चीन के तेज़ आर्थिक विकास की वजह से गाँवों में अपेक्षाकृत कम उत्पादक काम को छोड़कर शहरों की ओर आ रहे थे.

लेकिन ये हमेशा जारी नहीं रह सकेगा.

कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर बेरी आशनग्रीन चेतावनी देते हैं कि हर तेज़ बढ़ती अर्थव्यवस्था के विकास की दर का धीमा होना अपरिहार्य है और उन देशों में ये स्थिति जल्दी आ जाती है जहाँ उम्रदराज़ लोगों की आबादी बहुत अधिक है.

उनका कहना है कि चीन की एक बच्चे की नीति और लोगों औसत उम्र का बढ़ना जल्दी ही चीन को इस श्रेणी में ला खड़ा करेगी.

गोल्डमैन सैक्स के जिम ओ'नील ने ही ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन के समूह को ब्रिक्स का नाम दिया था. वे इस बात से सहमत हैं कि चीन के विकास की दर अब धीमी होगी और इस वर्ष क़रीब आठ प्रतिशत रह जाएगी.

लेकिन वे हार्ड लैंडिंग की बजाय हैप्पी लैंडिंग देखते हैं और कहते हैं कि इसकी वजह से चीन को महंगाई पर क़ाबू पाने में सफलता मिलेगी.

वे अर्थव्यवस्था की हवा निकलने के बारे में बात नहीं करते.

लुढ़कने का ख़तरा

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Image caption चीन का निर्यात उसके आयात से अधिक है

एक बात साफ़ है कि चीन के विकास का स्वरूप बदलेगा.

एक स्थिति ऐसी आएगी जिसमें बचत, निवेश और निर्यात के आकाश छूते आंकड़े उपभोक्ताओं के लिए खर्च का रास्ता भी बनाएँगे.

ऐसे समय में जब सभी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में उपभोक्ता खर्च कर रहे हैं तब निर्यात पर निवेश करना आसान नहीं होगा.

चीन में जैसे जैसे व्यवसाय बढ़ता जा रहा है उन्हें इस बात की आवश्यकता होगी कि वे अपना सामान या तो विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को बेचें या फिर चीनी उपभोक्ताओं को.

हो सकता है कि चीन का बढ़ता संपन्न मध्यम वर्ग ये बाज़ार उपलब्ध करवाए.

लेकिन हो सकता है कि आने वाले समय में चीन की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाकर लुढ़क पड़े.

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