समृद्धि और लोकतंत्र का जटिल रिश्ता

  • 29 जून 2011
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एशियाई देशों हो रहे विकास और उनमें लोकतंत्र की स्थिति पर लंदन में कई विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे जिनका मानना था कि लोकतंत्र और समृद्धि के आपसी रिश्ते बहुत जटिल हैं.

बीबीसी वर्ल्ड सर्विस की विशेष कवरेज पावर ऑफ़ एशिया के तहत लंदन स्टॉक एक्सचेंज में अंतरराष्ट्रीय परिचर्चा का आयोजन किया गया, जिसका विषय था-'डेमोक्रेसी ऑर प्रॉसपेरिटी?'

इस परिचर्चा का आयोजन बीबीसी वर्ल्ड सर्विस की चीनी, इंडोनेशियाई, वियतनामी, हिंदी और बर्मी सेवाओं ने मिलकर किया था.

बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार और पूर्वी एशियाई देशों के मामलों के जानकार ब्रिट यिप का कहना था कि इंटरनेट के आने से दुनिया भर में लोकतांत्रिकरण की प्रक्रिया अचानक बहुत तेज़ हो गई है और सरकारें सेंसरशिप कोशिशें कर रही हैं.

लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स के प्रोफ़ेसर अथर हुसैन का कहना था कि "इंटरनेट एक दोधारी तलवार है, मिसाल के तौर पर चीन में 20 करोड़ लोग इंटरनेट से जुड़े हुए हैं, उसके बाद अब कारोबार कर पाना मुश्किल है लेकिन इंटरनेट से सिर्फ़ कारोबार ही नहीं, विचार भी फैलते हैं जिन पर नियंत्रण कर पाना सरकारों के लिए बहुत मुश्किल है."

प्रोफ़ेसर हुसैन ने याद दिलाया कि देश में खुलेपन के बारे चीन के पूर्व राष्ट्रपति तंग श्याओ पिंग ने कभी कहा था, "खिड़कियाँ खोलने पर ताज़ा हवा तो आती है लेकिन मच्छर भी आते हैं."

अमरीका की बर्कले यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर मार्तिना ग्वेन का कहना था कि "कई एशियाई देशों में लोग एक पीढ़ी पहले तक ग़रीबी में जी रहे थे और अब वहाँ समृद्धि आ रही है इसलिए उनकी पहली चिंता अपनी स्थिति में सुधार की है, शायद यही वजह है कि कई एशियाई देशों में लोग राजनीतिक अधिकारों की बात करने के बदले समृद्धि पर अधिक ध्यान दे रहे हैं लेकिन यह अस्थायी स्थिति है जो समय के साथ बदलेगी".

प्रोफ़ेसर हुसैन का कहना था कि लोकतंत्र और समृद्धि का रिश्ता बहुत जटिल है और अलग-अलग देशों में स्थितियाँ भिन्न हैं, उन्होंने कहा कि बहुत सारे देश ऐसे हैं जहाँ लोकतंत्र नहीं है लेकिन आर्थिक विकास बहुत हुआ है जबकि बहुत सारे देश ऐसे हैं जहाँ तानाशाही है और वहाँ भारी विपन्नता है.

उलझे रिश्ते

प्रोफ़ेसर हुसैन कहा कि "यह निष्कर्ष निकालना पूरी तरह सही नहीं होगा कि लोकतंत्र से समृद्धि आती है या समृद्धि आने पर लोकतंत्र का रास्ता खुलता है, इनमें से कोई एक बात सही हो सकती है, कई बार दोनों बातें सही हो सकती हैं, कई बार दोनों ग़लत. हर तरह के उदाहरण मौजूद हैं और हर मामले को उस देश के परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए."

प्रोफ़ेसर मार्तिना का कहना था, "मौजूदा स्थिति ज़रूर बदलेगी, कई देशों में बदलाव देखने को मिल रहे हैं, लोग समृद्धि के बदले में कुछ समय के लिए अपने लोकतांत्रिक अधिकारों को दरकिनार करने को तैयार हो सकते हैं लेकिन हमेशा के लिए नहीं."

ब्रुनेल यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर गाय ल्यु का कहना था, "अगर लोकतंत्र एक सर्वमान्य सिद्धांत है तो सत्ता भी एक सर्वमान्य सिद्धांत है और कई देशों में लोग लोकतंत्र के पश्चिमी मॉडल के बदले अपने तरीक़े से आगे बढ़ना चाहते हैं, चीन इसका एक उदाहरण है जहाँ राजनीतिक व्यवस्था भले ही बहुत लोकतांत्रिक न हो लेकिन छोटे स्तर पर लोगों को महसूस होता है कि वे आज बहुत कुछ करने के लिए आज़ाद हैं जो पहले नहीं था."

लोकतंत्र के दूसरे फ़ायदे

प्रोफ़ेसर हुसैन का कहना था कि लोकतंत्र को सिर्फ़ समृद्धि के नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए, लोकतंत्र के दूसरे बड़े फ़ायदे भी हैं जिनकी मिसाल भारत पेश करता है.

उन्होंने कहा, "यह भारत का लोकतंत्र ही है जिसने इतनी विविधता वाली आबादी को एक सूत्र में जोड़े रखा है जबकि बहुत कम विविधता के बावजूद पाकिस्तान की दशा जैसी है संभवतः उसके पीछे लोकतंत्र के अभाव को एक प्रमुख कारण माना जा सकता है."

ज्यादातर वक्ताओं ने इस बात को रेखांकित किया एशिया तरह-तरह की आर्थिक और सामाजिक विविधताओं वाला समूह है जिसे एक इकाई के तौर पर देखना सही नहीं होगा लेकिन एक बात समान है कि ज्यादातर देशों में अमीरों और ग़रीबों के बीच गहरी खाई है.

एशियाई देशों के भविष्य के बारे में चर्चा के दौरान बर्मा के पत्रकार वान बियाक थांग ने कहा कि "एशिया का विकास संतुलित होना चाहिए, भारत और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं आगे आकर बर्मा जैसे जो देश पीछे हैं उनकी न सिर्फ़ आर्थिक बल्कि राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी मदद करनी चाहिए."

एक घंटे तक चली परिचर्चा में कई श्रोताओं ने सवाल पूछे और अपने विचार रखे, इस परिचर्चा में बर्मा, इंडोनेशिया, वियतनाम, भारत और चीन से आए छात्र भी शामिल हुए.

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