सिंगूर: मायूसी पर उम्मीद क़ायम

  • 29 जून 2011
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सिंगूर का विकास खंड कार्यालय, जहाँ पिछ्ले कई दिनों से ज़मीन वापस पाने की आस रखे किसान अपने ज़मीन के कागज़ जमा करा रहे थे वहाँ सर्वोच्च अदालत का स्थगन आदेश आते ही मायूसी छा गई.

कई किसान जो बरसते पानी और कीचड़ के बीच अपने ज़मीन के कागज़ों को प्लास्टिक के लिफाफों में संभाल कर लाए थे वो इस आदेश के बाद हतप्रभ खड़े हो गए.

यूँ तो कार्यालय में किसानों के कागज़ स्वीकार किया जाना बदस्तूर जारी है, लेकिन किसान परेशान हैं और वो ये जानना चाहते हैं कि अब इस आदेश के बाद उन्हें उनकी ज़मीन कब मिलेगी.

कई किसान अधिक जानकारी के लिए स्थानीय तृणमूल कांग्रेस के नेताओं की तलाश कर रहे हैं.

'अदालत ने किसानों की अनदेखी की'

तृणमूल के नेता महादेव दास कोलकाता में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आवास कालीघाट पर फ़ोन लगा कर सारे मामले को समझना चाहते हैं. दास पार्टी की तरफ से किसानों को ज़मीन लौटाने के काम की देख रेख कर रहे हैं.

महादेव दास ने का कहना था कि उनके पास तो सर्वोच्च अदालत के स्थगन आदेश की कोई कॉपी नहीं है इसलिए सिंगूर में काम जारी है.

उन्होंने आगे कहा, "ये तय है कि ये आदेश किसानों के ख़िलाफ़ गया है. हमें लगा था कि सर्वोच्च अदालत किसानों की परेशानी ध्यान में रखेगी पर ऐसा नहीं हुआ. लेकिन ज़मीन हमारी है और हम उसे हर हाल में लेकर रहेगें." सिंगूर थाना क्षेत्र में कई गाँवों की ज़मीन टाटा कंपनी के नैनो कार के कारखाने और उसके सहायक कारखानों के लिए अधिग्रहित की गई थी. इस क्षेत्र को बंगाल में धान और आलू उत्पादन के केंद्र के रूप में जाना जाता है.

प्रभावित किसानों और ऐसे भूमिहीन मज़दूरों जिनकी आजीविका अधिग्रहित ज़मीन से ही चलती थी, उनकी तादाद हज़ारों में है.

किसान नाउम्मीद नहीं

बुधवार सुबह पास के एक गाँव गोपाल नगर के एक किसान मधुसूदन कोले के घर पर त्यौहार जैसा माहौल था. उन्होंने और उनके परिवार ने ज़मीन पर डालने के लिए बीज जमा कर रखे हैं, ताकि ज़मीन वापस मिलते ही वो अपना काम शुरू कर दें.

उनके पड़ोसी किसान ने अपने ट्रैक्टर को रंग रोगन करा कर तैयार रखा है और उनसे आस-पास के किसान उनका ट्रैक्टर किराए पर लेने की बात करने भी पिछले दो चार-रोज़ से आ रहे हैं.

दिल्ली से अदालत के स्थगन आदेश के आने बाद ये किसान दुखी और परेशान हो गए और ज़्यादा जानकारी जुटाने के लिए दौड़ भाग करने लगे.

यूँ तो एक हज़ार एकड़ में ज़मीन अधिग्रहण से क़रीब 13000 किसानों की ज़मीनें गई थीं, लेकिन ज़्यादतर ने ज़मीन का मुआवज़ा ले लिया था. क़रीब 3000 किसानों ने अपनी ज़मीन के बदले में कुछ भी लेने से इनकार कर दिया था और ऐसे किसानों ने ही ममता बनर्जी के आंदोलन को जीवित रखा था.

इन 3000 किसानों में से क़रीब 900 किसान अब तक अपनी अधिग्रहित ज़मीन के कागज़ ला कर विकास खंड कार्यालय में जमा करा चुके हैं.

गोपाल नगर गाँव के एक किसान राजकुमार धारा ने कहा कि वो सर्वोच्च अदालत के स्थगन आदेश से थोड़ा मायूस हैं.

वो आगे कहते हैं कि स्थगन ही तो आया है, कोई आदेश उनके खिलाफ़ नहीं है. उन्होंने पांच साल तक अपनी ज़मीन वापस पाने के लिए लड़ाई लड़ी है और वे आगे भी लड़ेगें. चाहे जो हो वे अपनी ज़मीन नहीं छोड़ेगें.

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