इतिहास के पन्नों से

इतिहास के पन्नों को पलटा जाए तो पहली जुलाई. 1997 को ही हांगकांग में ब्रितानी औपनिवेशिक शासन ख़त्म हुआ और उसे चीन को सौंप दिया गया था जबकि 1994 में पहली जुलाई को ही फ़लस्तीनी नेता यासर अराफ़ात अपना निर्वासन ख़त्म कर स्वदेश वापस लौटे.

1997: हांगकांग का शासन चीन को सौंपा

Image caption द्वितीय विश्वयुद्ध के समय हांगकांग पर जापान का भी नियंत्रण रहा

पहली जुलाई को 150 साल के ब्रितानी औपनिवेशिक शासन के बाद हांगकांग का शासन चीन को सौंप दिया गया.

देश के गवर्नमेंट हाउस पर लहरा रहे ब्रितानी झंडे को नीचे उतार लिया गया और हांगकांग के आख़िरी गवर्नर क्रिस पैटन ने यहाँ से विदाई ली.

ब्रितानी झंडे को क्रिस पैटन को सौंप दिया गया और फिर उन्हें अपनी सरकारी रोल्स रॉयस से वापस छोड़े जाने के बाद उस कार को हांगकांग के नए प्रांतीय प्रमुख तुंग ची-हुआ को सौंप दिया गया.

अपने विदाई भाषण में क्रिस पैटन ने कहा, "इस शहर की कहानी आज की रात से पहले की है और और सफलता के उन अनेक वर्षों की भी जो आगे आने वाले हैं."

हांगकांग द्वीप पर 1842 से ब्रितानी नियंत्रण रहा था और इसमें सिर्फ़ वही दिन नहीं शामिल थे जब द्वितीय विश्व युद्ध में जापान ने इस पर अपना नियंत्रण क़ायम कर लिया था.

पहली जुलाई, 1997 के इस स्थानांतरण समारोह में मौजूद नामचीन लोगों में नव नियुक्त ब्रितानी प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, ब्रितानी शाही परिवार के उत्तराधिकारी प्रिंस चार्ल्स और चीन के तत्कालीन राष्ट्रपति जिआंग ज़ेमिन शामिल थे.

1994: यासर अराफ़ात स्वदेश वापस लौटे

Image caption वर्ष 2004 में अपनी मृत्यु के पूर्व तक यासर अराफ़ात रामाल्लाह में ही रहे

आज ही के दिन फ़लस्तीनी मुक्ति संगठन के प्रमुख यासर अराफ़ात 27 वर्ष के निर्वासन के बाद गज़ा पट्टी वापस लौटे थे.

फ़ौजी पोशाक और सर पर स्कार्फ़ बांधे हुए यासर अराफ़ात ने विजयी सैल्यूट देते हुए मिस्र की रफ़ाह सीमा पार की.

इससे पहले यासर अराफ़ात ने मिस्र की राजधानी काहिरा से तत्कालीन राष्ट्रपति होस्नी मुबारक़ के साथ हेलिकाप्टर पर उड़ान भरी थी.

उड़ान भरने से पहले यासर अराफ़ात ने कहा, "अब मैं पहली बार आज़ाद हुई फ़लस्तीन की धरती पर जा रहा हूँ आप ख़ुद ही सोच सकते हैं कि मेरे मन में और ह्रदय में किस तरह की भावनाएं होंगी."

हालांकि गज़ा पहुंचने के बाद यासर अराफ़ात के काफ़िले का रास्ता बदल दिया गया था क्योंकि फ़ार दोरोम में बसे इसराइली लोगों ने उन्हें जान से मारने की धमकी जारी की थी.

अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक यासर अराफ़ात को इसराइली दबाव की वजह से रामाल्लाह के पश्चिमी भाग में ही रहना पड़ा था.

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