अमरीका-तालिबान वार्ता का नाज़ुक दौर

  • 3 जुलाई 2011
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अगर अफ़गानिस्तान और इसके पड़ोसी देशों में शांति व स्थायित्व कायम करना है तो अमरीका और तालिबान के बीच जारी नाज़ुक बातचीत को पनपने देना ज़रूरी है. ये कहना है पाकिस्तान के जाने माने स्तंभकार अहमद रशीद का.

अमरीका और नैटो की गठबंधन सेनाएँ ये जानती हैं कि वो अफ़गानिस्तान से सफ़लतापूर्वक तब तक वापस नहीं जा सकती जब तक वहाँ जारी गृह युद्ध समाप्त ना हो जाए और अफ़गान सरकार और तालिबान के बीच राजनीतिक समझौता ना हो जाए.

इस तरह के समझौते में अफ़गानिस्तान और क्षेत्र के पड़ोसी देशों का भी ख्याल रखना होगा.

अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की योजना है 2012 सितंबर महीने तक अमरीका के 33 हज़ार सैनिकों को वापस बुलाना.

इसे देखते हुए नज़रें अमरीका और तालिबान के बीच जारी बातचीत पर टिकी हुई हैं. ख़ासकर ऐसे समय में जबकि तालिबान के साथ संघर्ष चल रहा है और पाकिस्तान तालिबान लड़ाकों के लिए सुरक्षित पनाहगाह यानि स्वर्ग बना हुआ है.

पिछले साल नवंबर महीने से अमरीका और तालिबान के बीच तीन दौर की सीधी बातचीत हो चुकी है.

बातचीत के दो दौर जर्मन शहर म्यूनिख़ में हुए और तीसरा क़तर की राजधानी दोहा में चला. जहाँ जर्मनी ने अपने देश में इस वार्ता को संभव बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वहीं तालिबान के कहने पर क़तर ने भी बातचीत में हिस्सा लिया.

हांलाकि वाशिंगटन में सरकारी अधिकारियों द्वारा हाल ही में लीक हुई सूचनाओं में कहा गया है कि काबुल और लंदन इस बातचीत को कमतर करके आंक सकते हैं. साथ ही वार्ता में भाग लेनेवाले लोगों की जान भी जोखिम में पड़ सकती है.

ये बेहद ज़रूरी है कि अंतर्राष्ट्रीय मीडिया और सरकारें अमरीका और तालिबान के बीच वार्ता को सफल होने दें. और इसका सिर्फ़ एक ही तरीका है कि वार्ता में प्रतिभागियों का सम्मान करें और गोपनीयता बरकरार रखें.

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Image caption राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने तालिबान से बातचीत के लिए 70 सदस्यों वाली शांति परिषद का गठन किया है.

दाँव पर न सिर्फ़ अफ़गानिस्तान की शांति है बल्कि पाकिस्तान समेत पूरे क्षेत्र की स्थिरता भी.

अमरीका और तालिबान के बीच बातचीत अभी भी प्रारम्भिक दौर में है जहाँ दोनों पक्ष एक दूसरे का विश्वास हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. पर असली बातचीत शुरु होनी अभी बाकी है.

आगे चलकर उन्हें हामिद करज़ई की सरकार और किसी स्तर पर पाकिस्तान को भी शामिल करना होगा जो कि पहले ही अमरीकियों पर वार्ता से हटने का आरोप लगा रहे हैं.

विश्वास बहाली की कोशिशें

इन सब के बीच दोनों पक्षों में विश्वास बहाली के प्रयास जारी हैं. राष्ट्रपति हामिद करज़ई तालिबान की मांग पर उसके कई लड़ाकों को काबुल में रिहा कर चुके हैं.

तालिबान ने अमरीका से भी मांग की है कि क्यूबा की ग्वांतानामो बे जेल में बंदी उनके कुछ शीर्ष नेताओं को रिहा कर दिया जाए.

इसमें 2001 से बंदी तालिबान के तीन वरिष्ठ कमांडर नूरूल्ला नूरी, मुल्ला फ़ज़ल और सबसे महत्वपूर्ण तालिबान के गृह मंत्री मुल्ला खरीउल्ला खरिख्वा शामिल हैं.

राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने तालिबान से बातचीत के लिए 70 सदस्यों वाली शांति परिषद का गठन किया है.

इस शांति परिषद ने भी वार्ता में हिस्सा लेने के लिए मुल्ला खरीउल्ला खरिख्वा को रिहा किए जाने की मांग की है.

हांलाकि इन सब की ग्वांतानामो बे जेल से रिहाई नही हो सकती क्योंकि हाल ही में अमरीकी संसद ने आतंकवादी कैदियों पर एक नया क़ानून पारित किया है जिसके तहत उन्हें क्यूबा के इस अमरीकी बंदीगृह से हटाया जाना है.

सत्रह जून 2011 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए अमरीका के उस अनुरोध को स्वीकार कर लिया जिसके तहत अल क़ायदा और तालिबान को अलग अलग श्रेणियों में रखने की बात कही गई थी.

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Image caption संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अल क़ायदा और तालिबान को अलग अलग श्रेणियों में रख दिया है

वर्ष 1998 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी की गई अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठनों की सूची में अल क़ायदा और तालिबान दोनों शामिल थे.

अब दोनों संगठन अलग अलग सूची में हैं. और अब संयुक्त राष्ट्र की ओर से जो प्रतिबंध अल क़ायदा पर लगाए गए हैं वो तालिबान पर लागू नही होंगे.

ऐसा करके अमरीका ने तालिबान के लिए बातचीत की राह को और आसान बना दिया है.

ये तालिबान के साथ हो रही गोपनीय वार्ता का ही नतीजा है.

अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा, विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन और निवर्तमान रक्षा मंत्री रॉबर्ट गेट्स ने भी खुलकर इन वार्ताओं के पक्ष में बयान दिए हैं.

साथ ही अमरीका चुपचाप इन तालिबान वार्ताकारों को खाड़ी देशों और यूरोप में आने जाने के लिए सुरक्षा मी मुहैया करा रहा है ताकि बातचीत जारी रह सके.

हर दौर की वार्ता के बाद राष्ट्रपति हामिद करज़ई को इसकी जानकारी दी जाती है.

राष्ट्रपति हामिद करज़ई भी तालिबान-अमरीका बातचीत का समर्थन कर रहे हैं हांलाकि उनकी सरकार भी अलग से तालिबान के साथ बातचीत कर रही है और कई दौर की बातचीत हो भी चुकी है.

हाल ही में पाकिस्तान के नेताओं को भी इस बातचीत का ब्यौरा दिया गया, उन्होंने बातचीत में पाकिस्तान को शामिल न किए जाने पर आपत्ति जताई.

चुनौतीपूर्ण वार्ता

पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान दोनों ही अलग-अलग तालिबान से वार्ता कर रहे हैं और काबुल को उम्मीद है कि पाकिस्तान का तालिबान भी इस वार्ता में शामिल हो.

काबुल में हुई इस बातचीत के सबसे ताज़े चरण में कोई बड़े फ़ैसले नहीं हुए क्योंकि पाकिस्तान अब भी नहीं चाहता है कि अफ़ग़ान सरकार के अधिकारी पाकिस्तान में तालिबान के नेताओं से मिलें.

न ही पाकिस्तान मुल्ला बिरादर और उसके सहयोगियों को रिहा करने के पक्ष में है.

तालिबान आंदोलन के उप नेता बिरादर को पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई ने एक साल पहले ग़िरफ़्तार किया था और हामिद करज़ई के बार-बार अनुरोध करने के बावजूद रिहा नहीं किया है.

पाकिस्तान अफ़ग़ानियों, अमरीकियों और तालिबान को शक़ की निगाह से देखता है क्योंकि उसे लगता है कि इस मामले में पाकिस्तानियों को दरकिनार किया जा रहा है.

पाकिस्तान समझता है कि अमरीका पाकिस्तान को नज़रअंदाज़ कर सीधा तालिबान से बात कर रहा है.

अमरीका और तालिबान के बीच वार्ता एक बड़ा क़दम है. लेकिन अब ज़रूरी ये है कि सभी पक्ष एक साथ आगे आएं और एक साझी नीति बनाकर इस युद्द को ख़त्म करें.

इस बीच ये भी ज़रूरी है कि राष्ट्रपति हामिद करज़ई अफ़ग़ानिस्तान में सहमति की एक ऐसी राजनीतिक ज़मीन तैयार करें ताकि ये वार्तांए सफल हो सकें.

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