मुंबई ही क्यों बनती है निशाना?

इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption मुंबई में बुधवार को एक मिनट के अंतराल पर तीन धमाके हुए

दो महीने पहले अमरीका के शहर शिकागो में मुंबई हमलों के एक अभियुक्त तहव्वुर हुसैन राणा के मुक़दमे में सबसे अहम गवाह थे डेविड कोलमैन हेडली.

हेडली ख़ुद भी मुंबई हमलों के एक बड़े अभियुक्त हैं. हेडली ने अपनी गवाही के दौरान एक बात कही थी जो दरअसल मुंबई वालों के इस सवाल का जवाब था कि मुंबई में ही क्यूं चरमपंथी हमला?

हेडली ने जज और जूरी को बताया की मुंबई में हमलों का फ़ैसला इसलिए किया गया था, क्योंकि ये भारत की प्रगति की धड़कन है, इसकी अर्थव्यवस्था की जान है. दूसरे ये कि इस शहर में विदेशी काफ़ी संख्या में रहते हैं और तीसरे ये की मुंबई एक आसान टार्गेट है.

आसान लक्ष्य है मुंबई

उज्ज्वल निकम मुंबई में हुए कई आतंकी हमलों के मुक़दमे की सरकार की तरफ़ से पैरवी करते आए हैं.

उनकी निगाह में मुंबई तीन कारणों से चरमपंथियों का निशाना बनती है. एक तो ये कि हमला करने वाले सांप्रदायिक भेद-भाव फैलाना चाहते हैं.

दूसरे ये कि मुंबई भारत का सबसे अमीर शहर है और तीसरे ये शहर एक सॉफ़्ट टार्गेट है. इन कारणों ने से वो ज़्यादा नुक़सान पहुंचा सकते हैं और पब्लिसिटी भी उन्हें मिल सकती है.

प्रसिद्ध वकील मजीद मेमन के अनुसार,"मुंबई भारत की जान है, सोने की चिड़िया है. इसे नुक़सान पहुंचा कर देश को नुक़सान पहुंचाना आसान है."

पिछले आठ सालों में एक रुझान-सा देखने को मिलता है. हर दो-तीन साल में मुंबई में चरमपंथी हमले हुए हैं. इनमें से अधिकतर बरसात में और शाम के वक़्त हुए हैं.

हां, हमला करने वाले भीड़-भाड़ वाले इलाक़ों को ही निशाना बनाते हैं. जब रुझान इतना साफ़ है तो पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियों का काम तो आसान हो जाना चाहिए.

न्यूयॉर्क में 2001 के हमलों के बाद और लंदन में 2005 के बम धमाकों के बाद दोबारा आतंकी हमले नहीं हुए हैं. क्या मुंबई को इन शहरों की तरह ही पूरी तरह से सुरक्षित बनाया जा सकता है?

मुंबई को सुरक्षित बना पाना मुश्किल

मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर एमएन सिंह कहते हैं, ''मुंबई को पूरी तरह से सुरक्षित करना लगभग असंभव है. 2008 के हमलों के बाद मुंबई को सुरक्षित बनाया गया है लेकिन स्लीपर सेल पर कड़ी निगरानी रखने की ज़रूरत है और खुफ़िया एजेंसियों को और चौकस करने की ज़रुरत है.''

इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption दादर, ज़वेरी बाज़ार और ओपरा हाउस इलाक़े में हुए धमाके

उज्ज्वल निकम के मुताबिक़ 'क़ानून को सख़्त बनाने की ज़रूरत है. अमरीका के होमलैंड सिक्योरिटी एक्ट की तरह भारत में भी इसी तरह का क़ानून हो तो इसका असर होगा.'

आतंकवाद निरोधी दस्ते के पूर्व प्रमुख के पी रघुवंशी ने एक बार बीबीसी को दिए इंटरव्यू में कहा था,''हम सौ गोल करते हैं तो हमारी थोड़ी बहुत प्रशंसा होती है लेकिन एक भी गोल हमारी तरफ़ हो जाता है, आतंकी क़ामयाब हो जाते हैं तो हमारी क़ामयाबी पर पानी फिर जाता है.''

लेकिन क्या इस एक गोल को रोका जा सकता है? मैंने जिससे भी इस बारे में बात की उसका यही कहना था कि ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल है.

संबंधित समाचार