एसपीओ की नियुक्ति असंवैधानिक

Image caption नक्सलवाद प्रभावित छत्तीसगढ़ में तैनात एसपीओ

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को छत्तीसगढ़ और केंद्र सरकार को माओवादियों और नक्सलियों के ख़िलाफ़ एसपीओ यानि विशेष पुलिस अधिकारियों के इस्तेमाल को रोकने का आदेश देते हुए इसे असंवैधानिक क़रार दिया है.

न्यायालय का कहना है कि कम पढ़े-लिखे, बिना सही प्रशिक्षण और हथियार के माओवादियों के ख़िलाफ़ अभियान में लगाए गए जनजातीय युवकों के इस्तेमाल को रोका जाना चाहिए क्योंकि ये संविधान के प्रावधानों के ख़िलाफ़ है.

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को विशेष पुलिस अधिकारियों से सभी हथियार और गोलाबारूद तुरंत वापस लेने का भी निर्देश दिया है.

अदालत का कहना था कि अगर ये सशस्त्र जनजातीय युवक राज्य के ख़िलाफ़ खड़े हो गए तो ख़तरनाक स्थिति पैदा हो सकती है.

इसके साथ ही अदालत ने केंद्र सरकार को विशेष पुलिस अधिकारियों के चयन के लिए राज्यों को दिए जानेवाले पैसे को रोकने का भी आदेश दिया है.

कोर्ट ने कहा कि कोया कमांडो और सलवा जुडूम का गठन भी संविधान के ख़िलाफ़ है.

प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा इस मामले में एक याचिकाकर्ता हैं. उन्होंने बीबीसी हिंदी सेवा से हुई एक विशेष बातचीत में माँग की कि सुप्रीम कोर्ट एक कमेटी का गठन करे जो इस बात पर नज़र रखे कि उसके आदेश का पालन किया जा रहा है या नहीं.

राम गुहा ने कहा, "मुझे छत्तीसगढ़ सरकार पर क़तई भरोसा नहीं है क्योंकि पहले भी कई बार उसने अदालत के आदेशों की अनदेखी की है."

कोया कमांडो

Image caption विशेष पुलिस अधिकारी ही कोया कमांडो कहलाते हैं

छत्तीसगढ़ में विशेष पुलिस अधिकारियों को कोया कमांडो नाम दंतेवाड़ा क्षेत्र की एक जनजाति के नाम पर दिया गया है.

विशेष पुलिस अधिकारी का मामला नक्सलवाद प्रभावित इलाक़ों में माओवादियों से लड़ने के लिए सलवा जुडूम के अस्तित्व के ख़िलाफ़ दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान उठा था.

ये याचिका समाजशास्त्री नंदिनी सुंदर, इतिहासकार रामचंद्र गुहा, पूर्व नौकरशाह ई ए एस सरमा और अन्य लोगों ने दायर की थी जिसमें कहा गया है कि सलवा जुडूम को कथित मदद देने से राज्य सरकार को रोकने का निर्देश दिया जाना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से उन राज्यों को धक्का लगा है जिन्होंने नक्सलियों और चरमपंथियों से मुक़ाबले के लिए विशेष पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति कर रखी थी.

सीबीआई जांच के आदेश

इसके साथ ही अदालत ने मार्च में छत्तीसगढ़ गए सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश पर हुए हमले की जांच सीबीआई से कराने का भी आदेश दिया है.

जस्टिस बी सुदर्शन रेड्डी और जस्टिस एस एस निज्जर की पीठ ने कहा, ''हम सीबीआई को स्वामी अग्निवेश और उनके समर्थकों के साथ हुई हिंसा और हमले की जांच करने का निर्देश देते हैं.''

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Image caption स्वामी अग्निवेश पर दंतेवाड़ा इलाक़े में हमला हुआ था

स्वामी अग्निवेश पर हुए हमले का मामला अदालत के सामने इसी साल अप्रैल में आया था.

स्वामी अग्निवेश कहते रहे हैं कि सलवा जुडूम अभी भी सक्रिय है और मुख्यमंत्री दोहरी बातें कर रहे हैं क्योंकि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की अनुशंसाओं के अनुरूप सलवा जुडूम के किसी भी सदस्य के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दायर नहीं की गई है.

स्वामी अग्निवेश ने इसी साल मार्च में उनपर हुए कथित एसपीओ और सलवा जुडूम कार्यकर्ताओं के हमले के बाद अदालत में याचिका दायर की थी.

अग्निवेश पर हमला उस समय किया गया था जब वे श्री श्री रविशंकर के आर्ट ऑफ़ लिविंग कार्यकर्ताओं के साथ दंतेवाड़ा के एक नक्सलवाद प्रभावित इलाक़े का दौरा कर रहे थे.

इस मामले पर चार मई को हुई पिछली सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने विशेष पुलिस अधिकारी की नियुक्ति को इस आधार पर सही ठहराया था कि वो पुलिस की भूमिका बख़ूबी निभा रहे हैं.

राज्य सरकार ने ये भी तर्क दिया था कि माओवादियों के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे अभियान में ये विशेष पुलिस अधिकारी गाइड, अनुवादक और भेदिये की भूमिका निभा रहे हैं.

साथ ही कुछ अहम मौक़ों पर इन अधिकारियों ने राहत शिविरों पर हुए दर्जनों माओवादी हमलों के दौरान नियमित सुरक्षाकर्मियों की जानें भी बचाई हैं और ऑपरेशन में उनकी मदद भी की है.

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