सऊदी अरब को जर्मन टैंक बिक्री पर बहस

  • 6 जुलाई 2011
जर्मनी का लियोपार्ड द्वितीय युद्धक टैंक इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption सऊदी अरब पिछले तीस वर्षों से जर्मन टैंक ख़रीदने की कोशिश कर रहा है लेकिन इसराइल की मर्ज़ी नहीं थी

जर्मन संसद सऊदी अरब को 200 टैंकों की बिक्री की गुप्त योजना पर ज़ोरदार बहस करने वाली है क्योंकि देश की ये नीति है कि तथाकथित दमनकारी सत्ता वाले देशों को कोई हथियार वग़ैरा नहीं बेचे जाएंगे.

जर्मन पत्रिका स्पीजेल ने इस बिक्री का समाचार रविवार को प्रकाशित किया था और सऊदी अरब की राजधानी रियाद में भी अधिकारियों ने इस ख़बर की पुष्टि की थी.

जर्मन विपक्षी दलों ने चिंता जताई है कि सऊदी अरब सरकार बहरीन में सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों के दमन में सहयोग करती रही है.

जर्मनी के रक्षा मंत्री ने इस मुद्दे को क्लासिफ़ायड क़रार देते हुए इस पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया है. लेकिन विपक्षी सांसदों का कहना है कि वो इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ गठबंधन से अपने सवालों के जवाब मांगेगे.

ग्रीन पार्टी के संसदीय दल के नेता जुएर्जेन ट्रिटिन का कहना था, “सरकार को किसी ना किसी स्तर पर गोपनीयता के पर्दे को हटाना ही होगा और पूरी तरह से खुलकर बात करनी होगी.”

उन्होंने कहा, “जब सरकार सऊदी अरब को इतने बड़े और भारी भरकम टैंक बेचने वाली है तो इस ख़बर को गोपनीय रखने की कोशिश ही बेमानी है.”

समझा जाता है कि सऊदी अरब सरकार 200 लियोपार्ट द्वितीय टैंक जर्मनी से ख़रीदने वाली है जो युद्धक टैंक हैं.

लियोपार्ड द्वितीय टैंकों का इस्तेमाल जर्मन और नैटो सेनाएँ करती हैं और इनका इस्तेमाल कोसोवो और अफ़ग़ानिस्तान में भी हुआ है.

सऊदी अरब के पास पहले से ही लगभग एक हज़ार मुख्य युद्धक टैंक मौजूद हैं जो अमरीका और फ्रांस निर्मित हैं.

सऊदी अरब के हथियारों को इस मार्च 2011 में तब गतिविधियों में देखा गया था जब पड़ोसी देश बहरीन में सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों को दबाने के लिए ये हथियार भेजे गए थे.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कहा गया था कि बहरीन के शासकों को बचाने के लिए सऊदी अरब ने ये सैनिक सहायता वहाँ भेजी थी, हालाँकि सऊदी अरब ने कहा था कि सरकारी संस्थानों और महत्वपूर्ण ठिकानों की हिफ़ाज़त के लिए वो सैनिक भेजे गए थे.

बदले-बदले हालात

समाचार एजेंसी रॉयटर्स का कहना है कि सऊदी अरब सरकार पिछले तीस वर्षों से जर्मन टैंक ख़रीदना चाहती थी लेकिन ये सौदा पक्का नहीं हो सका.

ख़बरों में कहा गया है कि जर्मनी ने ये टैंक सऊदी अरब को बेचने का सौदा पक्का करने से पहले अमरीका और इसराइल से सलाह ली है.

जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल की क्रिश्चियन डेमोक्रेट पार्टी के एक सदस्य और अरब मामलों के विशेषज्ञ जोआशिम होअर्स्टर का कहना था, “अगर सऊदी अरब को इस तरह के टैंक बेचे जाते हैं तो आमतौर पर समझा जाता है कि इसराइल इस पर आपत्ति करेगा. अतीत में ऐसा ही होता रहा है इसलिए सऊदी अरब को जर्मन टैंक नहीं बेचे गए हैं.”

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Image caption अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने बहरीन में सऊदी सैनिकों की मौजूदगी को नज़रअंदाज़ किया है.

उनका कहना था, “लेकिन मध्य पूर्व में नई भौगोलिक और राजनीतिक परिस्थितियों में इतने बड़े बदलाव आए हैं कि इसराइल ने ऐसे मामलों पर टिप्पणी करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है. और इसराइल का ये रुख़ स्थिति को स्पष्ट करने में सक्षम है.”

विपक्षी सोशल डेमोक्रेट के संसदीय दल के उपनेता गरनॉट अर्लर ने चांसलर एंगेला मर्केल पर आरोप लगाया है कि उन्होंने करके निर्णय लेने की भयावह अक्षमता दिखाई है.

एक अख़बार को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि चांसलर और विदेश मंत्री ने इस तरह की नीति अपनाकर अरब देशों में लोकतंत्र समर्थक आंदोलनों को सिर्फ़ ज़ुबानी समर्थन ही दिया है.

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