दवाओं से ज़्यादा कारगर है भरोसा

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पुरानी कहावत है दवा से ज़्यादा दुआ का असर होता है.

लेकिन अब वैज्ञानिकों का कहना है कि दवाओं का असर तब और ज़्यादा होता है जब मरीज़ को उन दवाओं पर भरोसा हो.

अमरीका के कुछ वैज्ञानिकों ने गहन शोध के बाद ये नतीजा निकाला है.

उनका कहना है कि किसी मरीज़ का इलाज करते वक़्त उसके विश्वासों और भावनाओं का बहुत ध्यान रखा जाना चाहिए.

वैज्ञानिकों ने ऐसे सात सौ लोगों पर प्रयोग किए जो सामान्य सर्दी-ज़ुकाम से परेशान थे.

दिलचस्प नतीजे

सर्दी-ज़ुकाम का कोई इलाज नहीं होता और माना जाता है कि ये ख़ुद ब ख़ुद ठीक हो जाती है भले ही आप दवा खाएँ या न खाएँ.

बीबीसी संवाददाता पीटर नैटलशिप का कहना है कि इस अध्ययन के नतीजे बहुत ही दिलचस्प हैं.

अमरीकी वैज्ञानिकों ने अपने शोध के नतीजे ‘ऐनल्स ऑफ़ फ़ैमिली हिस्टरी’ नामक चिकित्सा पत्रिका में प्रकाशित किए.

बिना दवा खाए या कोई बेअसर दवा खाने से आराम पाने को मेडिकल की दुनिया में ‘प्लासेबो इफ़ेक्ट’ कहा जाता है.

इसमें बीमार ये सोचता है कि दवाएँ खाने से वो ठीक हो रहा है लेकिन वास्तव में दूसरे कारणों से स्वास्थ्य में सुधार हो जाता है.

प्रयोग की प्रक्रिया

Image caption बीमारियों के इलाज के लिए दवाओं पर भरोसा ज़रूरी है.

लगभग सभी समाजों में परंपरागत तौर पर इस असर को स्वीकार किया गया है.

लेकिन अमरीकी वैज्ञानिकों की टीम ने इस विश्वास को आधार बनाते हुए एक और काम किया.

जिन सात सौ लोगों पर प्रयोग किया गया था वो सर्दी-ज़ुकाम से पीड़ित थे.

उनमें से कुछ लोगों को कोई दवा नहीं दी गई और कुछ लोगों को यूँ ही कुछ ऐसी दवाएँ दे दी गईं जो सीधे सीधे सर्दी-ज़ुकाम के इलाज के काम नहीं आतीं.

शोधकर्ताओं ने पीड़ितों को बताया कि उन्हें सर्दी-ज़ुकाम से निजात दिलाने के लिए भृंगराज का सत्व दिया जा रहा है.

नतीजा

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Image caption हर समाज में चिकित्सा की विभिन्न प्रणालियाँ हैं.

सच ये था कि उन्हें भृंगराज वनस्पति का सत्व नहीं दिया जा रहा था. उन्हें कोई दूसरी ही चीज़ दी गई जिसे वे भृंगराज समझ कर खा रहे थे.

हालांकि मरीज़ों को यक़ीन था कि जो सत्व वो ले रहे हैं उससे उन्हें स्वास्थ्य लाभ होगा.

दूसरे समूह को कोई दवा नहीं दी गई.

नतीजा ये निकला कि उन लोगों के स्वास्थ्य में जल्दी सुधार हो गया जिन्हें ये ग़लतफ़हमी थी कि उन्हें भृंगराज सत्व दिया जा रहा है.

जबकि जिन्हें कोई दवा नहीं दी गई उनको स्वास्थ्य लाभ होने में काफ़ी समय लगा.

यानी जिन लोगों को ये भरोसा था कि भृंगराज वनस्पति से उन्हें फ़ायदा होगा उनकी हालत जल्दी सुधर गई.

यानी असर दवा का नहीं था बल्कि दवा पर मरीज़ के भरोसे का था.

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