पत्रकारों को मुफ़्त मकान

राष्ट्रपति इल्हाम अलियेव इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption राष्ट्रपति ने विपक्षी रैलियों को दबाने के लिए पुलिस का भरपूर इस्तेमाल किया है.

अज़रबैजान की सरकार ने पत्रकारों को मुफ़्त मकान देने की घोषणा की है.

निर्णय के विरोधियों ने इस कदम को मीडिया के ऊपर सरकार के और अधिक नियंत्रण की एक चाल बताया है. सरकार का कहना है कि ये पत्रकारों को महज़ सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराने की दिशा में उठाया गया एक कदम है. सरकार के प्रवक्ता का कहना है कि पत्रकार जो चाहें वो लिखने के लिए स्वतंत्र हैं. अज़ेरी न्यूज़ एजेंसी को दिए गए एक साक्षात्कार में राष्ट्रपति के प्रवक्ता अली हसनोव ने पत्रकारों से राष्ट्रभक्ति से प्रेरित हो कर राष्ट्र समर्थक होने की अपील भी की. हसनोव के अनुसार हर पत्रकार "राष्ट्रीय और आध्यात्मिक मूल्यों का ध्वजावाहक होता है और देश का रक्षक होता है." राजधानी बाकू में पत्रकारों के लिए इमारतें बनाने का काम शुरू होने वाला है. देश की अर्थव्यवस्था में तेल उत्पादन के चलते आए उछाल की वजह से मकानों की कीमतों में भी वृद्धि हुई है.

विरोध

अज़रबैजान में 'इंस्टीट्यूट फॉर वॉर एंड पीस रिपोर्टिंग' की प्रमुख समीरा अहमदबेली का कहना है कि पत्रकारों से राष्ट्रभक्ति की अपील का मतलब दरअसल उनसे सरकार का अधिक समर्थन करने की अपील है. समीरा अहमदबेली कहती हैं, "राष्ट्रभक्त होने के नाते हमसे केवल सकारात्मक चीज़ें लिखने की उम्मीद है किसी नकारात्मक टिप्पणी की नहीं. इसीलिए वो पत्रकार जो सच लिखते हैं वो गिरफ़्तार कर लिए जाते हैं. सरकार मानती है कि जो पत्रकार सरकार के पक्ष में नहीं लिखते वो शर्तिया आर्मेनिया के जासूस होंगें." अज़रबैजान और आर्मेनिया के बीच शत्रुतापूर्ण संबंध हैं. दोनों देश 1988 में नाग्रोनो-काराबाख के विवादित क्षेत्र के लिए एक युद्ध भी लड़ चुके हैं. अज़रबैजान की सरकार देश में विपक्षी कार्यकर्ताओं को लेकर भी असहज है. कुछ समय पहले देश में सरकार विरोधियों ने मिस्र की तर्ज़ पर देश के राष्ट्रपति इल्हाम अलियेव के खिलाफ़ एक व्यापक जनांदोलन खड़ा करने की कोशिश भी की थी. अलियेव और उनका परिवार देश पर करीब दो दशकों से शासन कर रहा है. प्रदर्शनों के शुरू होने के पहले ही आंदोलन को कुचल दिया गया और विपक्षी नेताओं को प्रदर्शनों में पहुँचने के पहले ही उनके घरों और रास्ते से गिरफ़्तार कर लिया गया.

पत्रकारों को मकान देने का फ़ैसला भले ही सामान्य दिखता हो लेकिन वो सरकार जो अपने समर्थक मीडिया संगठनों को लाखों डॉलर देती है उसकी तरफ़ से ये फ़ैसला मीडिया पर अपना कब्ज़ा मज़बूत करने वाला ही दिखता है.