उत्तरी श्रीलंका में 29 साल बाद चुनाव

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Image caption जाफना के एक मतदान केंद्र में लगी मतदाताओं की भीड़

श्रीलंका के उत्तरी हिस्सों में 29 साल में पहली बार लोग स्थानीय निकायों के लिए शनिवार को मतदान कर रहे हैं.

ये वो इलाके हैं जो एलटीटीआई विद्रोहियों के नियंत्रण में थे और सालों तक गृहयुद्ध की चपेट में रहे हैं.

हालांकि यह स्थानीय निकायों के चुनाव हैं लेकिन फिर भी देश की राजनीति के लिए ये बहुत ही महत्वपूर्ण हैं जहाँ सत्ताधारी और विपक्षी दलों के लिए बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है.

राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की सत्ताधारी पार्टी तमिल बहुलता वाले उत्तरी श्रीलंका में अधिक लोकप्रिय नहीं है. पिछले साल के राष्ट्रपति चुनाव में यहाँ के लोगों ने महिंदा राजपक्षे के एकमात्र विरोधी उम्मीदवार जनरल सरथ फ़ोंसेका के पक्ष में खूब मत डाले थे.

सत्ताधारी पार्टी ने इस इलाके में इस बार प्रचार में पूरी ताकत झोंक रखी है और कई केंद्रीय मंत्री इस इलाके में डेरा डाले हुए पड़े हैं. सत्ताधारी पार्टी के उम्मीदवारों के पोस्टरों से दीवारें पटी पड़ी हैं.

विपक्षी दलों का आरोप

इस इलाके में लोकप्रिय तमिल नेशनल एलायंस सत्ताधारी पार्टी की तुलना में कम ही नज़र आ रही है.

तमिल नेशनल एलायंस के सांसद एमए सुमनथिरन आरोप लगाते हैं, "हमारी पहली ही बैठक पर सेना के वर्दीधारी सैनिकों ने हमला कर दिया. उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, कोई गिरफ़्तार नहीं किया गया."

तमिल नेशनल एलायंस के एक स्थानीय प्रत्याशी के घर के बाहर दरवाज़े पर एक कुत्ते का कटा हुआ सर टंगा मिला. कुछ अन्य प्रत्याशी दरवाज़ों पर श्रद्धांजलि के फूल मिलने की बात भी कर रहे हैं.

सरकार इस तरह के सभी आरोपों से इनकार करती है. सरकार के पक्ष की तमिल पार्टी का दावा है की तमिल नेशनल अलायंस के नेता सहानूभूति झटकने के लिए खुद इस तरह की चीज़ें करवा रहे हैं.

गैर सरकारी संगठनों का कहना है कि सरकार से संबधित पार्टियों के नेता सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग कर रहे हैं.

तमिल नेशनल एलायंस अपने आप को देश के उत्तर और पूर्व में तमिल लोगों का मुख्य प्रतिनिधि मानती है इसलिए उसने भी इन चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए पूरी ताकत झोंक रखी है.

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